250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करे।
अध्याय 6.27. जीवन निर्वाह के लिए केवल तपस्वी वानप्रस्थाश्रमियों के यहां भिक्षा ग्रहण करे और उनका भी अभाव होने पर वन में निवास करने वाले अन्य गृहस्थ द्विजों से भिक्षा ग्रहण करे।
अध्याय 6.28. उन वनवासी गृहस्थों का भी अभाव होने पर वन में ही निवास करता हुआ ग्राम से वृक्ष-पत्रों में या सकोरों के खण्डों में अथवा हाथ में ही भिक्षा ला कर केवल आठ ग्रास भोजन करे।
अध्याय 6.29. वन में निवास करता हुआ ब्राह्मण इन नियमों को तथा स्वशास्त्रोक्त नियमों का पालन करे और आत्मसिद्धि के लिये उपनिषदों तथा वेदों में कथित वचनों का अभ्यास करे।
मनुस्मृति में संन्यासी के लिए निम्न विधान हैंः ख्1,
अध्याय 6.38. जिसमें समस्त सम्पत्ति को दक्षिणा रूप में देते हैं ऐसे प्राजापत्य यज्ञ का अनुष्ठान कर और उसमें कथित विधि से अपने में अग्नि का आरोप कर ब्राह्मण घर से संन्यास आश्रम को ग्रहण करें।
अध्याय 6.39. जो सब प्राणियों के लिए अभय देकर गृह से संन्यास ले लेता है, उस ब्राह्मण के तेजोमय लोक होते हैं अर्थात् वह उन लोकों को प्राप्त करता है।
अध्याय 6.40. जिस द्विज से जीवों को लेशमात्र भी भय नहीं होता, शरीर से विमुक्त हुए उस द्विज को कहीं से भी भय नहीं होता।
अध्याय 6.41. पवित्र कमण्डल, दण्ड आदि से युक्त मौन धारण किया हुआ घर से निकला हुआ और उपस्थित इच्छा प्रवर्त्तक वस्तु में निःस्पृह होकर संन्यास ग्रहण करे।
अध्याय 6.42. अकेले सिद्धि को देखता हुआ द्विज दूसरे किसी का साथ न करके अकेला ही मोक्ष के लिए चले, इस प्रकार वह किसी को नहीं छोड़ता है और न उसे कोई छोड़ता है।
अध्याय 6.43. लौकिक अग्नि से रहित, गृह से रहित, शरीर में रोगादि होने पर भी चिकित्सा आदि का प्रबंध न करने वाला, स्थिर बुद्धिवाला, ब्रह्म का मनन करने वाला और ब्रह्म में ही भाव रखने वाला संन्यासी भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करे।
- सै.बु.ई. खंड 25, अध्याय 6, श्लोक 38-45, पृ, 205-206