परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 266

परिशिष्ट- I

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अध्याय 6.44. एक खपरा, पेड़ों की जड़ (रहने के लिए कंदरा), पुराना व मोटा या वृक्ष का वल्कल कपड़ा अकेलापन, ममता और सब में समान भाव से, ये मुक्त के लक्षण हैं।

अध्याय 6.45. मरने या जीने, इन दोनों में से किसी की चाह न करे किन्तु नौकर जिस प्रकार वेतन की प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार काल की प्रतीक्षा करते रहे।

अध्याय 6.49. ब्रह्म ध्यान में लीन योगासनों में बैठा हुआ, अपेक्षा से रहित, मांस की अभिलाषा से रहित और शरीर मात्र सहायक से युक्त मोक्ष सुख को चाहने वाला इस संसार का विचरण करे।

अध्याय 6.50. चमत्कार और अपशकुन, ज्योतिष और हस्तरेखा विज्ञान, व शास्त्र शिक्षा आदि के द्वारा कभी भी भिक्षा लेने की इच्छा न करे।

अध्याय 6.51. बहुत से वानप्रस्थों या अन्य साधुओं, ब्राह्मणों, पक्षियों, कुत्तों या दूसरे भिक्षुकों से युक्त घर में न जावे।

अध्याय 6.52. बाल, नाखून और दाढ़ी-मूंछ कटवा कर, भिक्षापात्र, दण्ड तथा कमण्डल को लिये हुए किसी प्राणी को पीडि़त न करता आत्मसंयमी रहते हुए सर्वदा विचरण करे।

अध्याय 6.53. उसके भिक्षापात्र धातु के न हों, छिद्र रहित हों, उनकी शुद्धि यज्ञ में चमस के समान केवल पानी से होती है।

अध्याय 6.54. तुम्बा, लकड़ी, मिट्टी, बांस के पाच्यतियों के हों ऐसा स्वायंभूव पुत्र ने कहा है।

अध्याय 6.55. संन्यासी जीवन-निर्वाह के लिए दिन में एक बार ही भिक्षा ग्रहण करे, तथा उसको भी अधिक प्रमाण में लेने में आसक्ति न करे, क्योंकि भिक्षा में आसक्ति रखने वाला संन्यासी विषयों में भी आसक्त हो जाता है।

अध्याय 6.56. घरों में जब धुंआ दिखाई न पड़ता हो, मूसल का शब्द न होता हो, आग बुझ गयी हो, सब ने भोजन कर लिये हों, और खाने के पत्तल बाहर फेंक दिये गये हों, तब भिक्षा के लिए संन्यासी सर्वदा निकले।

अध्याय 6.57. भिक्षा न मिलने पर विषाद और मिलने पर हर्ष न करे। जितनी भिक्षा से जीवन निर्वाह हो सके, उतने ही प्रमाण में भिक्षा मांगे। दण्ड, कमण्डल आदि की मात्रा में भी आसक्ति न करे।

  1. सै.बु.ई. अध्याय 6, पृ, 207-209