परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 267

252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अध्याय 6.58. विशेष रूप से आदर-सत्कार के साथ मिलने वाली भिक्षा की सर्वदा निंदा करे, क्योंकि पूजापूर्वक होने वाली भिक्षा प्राप्ति से मुक्त भी संन्यासी बंध जाता है।

अध्याय 6.59. विषयों की ओर आकृष्ट होती हुई इन्द्रियों को थोड़ा भोजन और एकांतवास के द्वारा रोके।

अध्याय 6.60. इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से रोकने से राग और द्वेष के त्याग से और प्राणियों की अहिंसा से मुक्ति के योग्य होता है।

अध्याय 6.80. जब विषयों में दोष की भावना से सब विषयों से निःस्पृह हो जाता है, तब इस लोक में तथा परलोक में नित्य सुख को प्राप्त करता है।

अध्याय 6.81. इस प्रकार सब संगों को धीरे-धीरे छोड़कर तथा सब द्वंद्वों से छुटकारा पाकर ब्रह्म में ही लीन हो जाता है।

अध्याय 6.82. यह सब परमात्मा में ध्यान से होता है। अध्यात्मज्ञान से शून्य ध्यान का फल कोई भी नहीं प्राप्त करता है।

अध्याय 6.83. यज्ञ तथा देव के प्रतिपादक वेदमंत्र को, जीव के स्वरूप का प्रतिपादक वेदमंत्र को और ब्रह्मप्रतिपादक वेदान्त में वर्णित मंत्र को जपे।

अध्याय 6.84. वेदार्थ को नहीं जानने वाले के लिए यही वेद शरण है, और वेदार्थ जानने वालों के लिए स्वर्ग चाहने वालों के लिये भी यही वेद शरण है।

अध्याय 6.85. इस क्रम से जो द्विज संन्यास लेता है वह इस संसार में पाप को नष्ट कर उत्कृष्ट ब्रह्म को प्राप्त करता है।

वानप्रस्थ और संन्यासी की तुलना से ज्ञात होता है कि इनके पालन में इतना साम्य है कि हमें यह जिज्ञासा होती है कि इन दोनों अवस्थाओं को भिन्न क्यों रखा गया है? दोनों के बीच बहुत कम अंतर है। पहली बात तो यह है कि वानप्रस्थ अपनी पत्नी को साथ रख सकता है, संन्यासी नहीं। दूसरे यह कि वानप्रस्थ अपनी सम्पत्ति रख सकता है और संन्यासी को उसका परित्याग करना होता है। तीसरे यह कि वानप्रस्थ वनों में निवास बना सकता है किन्तु संन्यासी एक ही स्थान पर नहीं टिक सकता है, उसे एक से दूसरे स्थान तक रमण करना होता है। शेष बातों में दोनों का जीवन समान है। ब्राह्मणों ने वानप्रस्थ की अतिरिक्त मान्यता क्यों रखी जबकि संन्यास पर्याप्त था? परन्तु यह प्रश्न तो फिर भी बरकरार रहता है कि इन दोनों की ही क्या आवश्यकता थी? ये आत्म-बलिदान का उदाहरण नहीं कही जा सकती। वानप्रस्थ और संन्यासी

  1. सै.बु.ई., खंड 25, श्लोक 80-85, पृ, 213-214