परिशिष्ट- I
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केवल वृद्ध ही हो सकते हैं। मनु इस संबंध में आश्वस्थ हैं कि एक अवस्था में मनुष्य वानप्रस्थी हो जाए। इसका समय तभी आता है जब झुर्रियां पड़ने लगें। यह काफी आयु में होता है। संन्यासी की आयु तो और भी अधिक होनी चाहिए। ऐसे व्यक्तयों को आत्मत्यागी कहना गलती है, जिन्होंने जीवन के सभी सुख भोगे हों और जब वे सुख भोगने योग्य ही न रहें तो उनका परित्याग कर दें। यह निर्विवाद है कि परिवार और गृह-त्याग, समाज-सेवा अथवा दीन-दुखियों की सेवा के उद्देश्य से नहीं किया जाता। इसका आशय है, तपस्या करना और शांतिपूर्वक मृत्यु की प्रतीक्षा करना! यह एक मजाक ही है कि वृद्ध व्यक्तियों को घर-परिवार से दूर जंगलों में मरने के लिए छोड़ दिया जाए, जहां उनके लिए कोई दो आंसू बहाने वाला भी न हो।
ब्राह्मणों ने नियोजित अर्थ-व्यवस्था के उद्देश्य से आश्रम-प्रणाली बनाई। यह इतनी बड़ी मूर्खता है कि उसका कारण और उद्देश्य समझ पाना एक बहुत बड़ी पहेली है।