परिशिष्ट- II
अनिवार्य वैवाहिक व्यवस्था
मनु की व्यवस्था है कि संसार में लोगों का जीवन चार भागों में विभाजित हो। ये चार अवस्थाएं हैंः 1. ब्रह्मचर्य, 2. गृहस्थ, 3. वानप्रस्थ और संन्यास। ब्रह्मचर्य विद्यार्थी जीवन है। एक ऐसी अवस्था, जब मनुष्य का जीवन वेदों के अध्ययन को समर्पित होता है। गृहस्थाश्रम का अर्थ है, वैवाहिक जीवन। जैसा कि मनु ने कहा है, गृहस्थ रहकर सुख भोगना और परिवार-वृद्धि करना। वानप्रस्थ की स्थिति में गृहस्थी से दूर रहना होता है_ वह गृह-त्याग कर देता है फिर भी वह अपनी पत्नी का त्याग नहीं करता। वह जंगलों में रहता है किन्तु अपनी सम्पत्ति का अधिकार नहीं त्यागता। जहां तक गृहस्थ जीवन और धार्मिक कृत्यों का संबंध हैं, वह मरे के समान है किन्तु सामाजिक रूप से वह मरता नहीं है। संन्यास वह अवस्था है, जब मनुष्य अपने वैवाहिक बंधन तोड़ देता है। वह गृहस्थी त्याग देता है और गृहस्थों के लिए आवश्यक धर्म-कर्म से नाता तोड़ लेता है और ब्रह्म की उपासना हेतु जंगलों में चला जाता है। ऐसा समझा जाता है कि उसका सामाजिक अंत हो गया है।
मनुष्य-जीवन की विभाजन-प्रथा उससे भी पुरानी है जितनी मनु की। महत्वूपर्ण बात यह है कि मनु ने इसमें संशोधन कर दिया।
प्रथम परिवर्तन यह है कि मनु ने विवाह को अनिवार्य बना दिया। किसी ब्रह्मचारी को अध्ययन समाप्त करने पर विवाह करना चाहिए। यह नियम मनु ने बनाया, जो निम्न व्यवस्थाओं से प्रकट हैः
3.2. (एक विद्यार्थी) जसने विद्यार्थिपन बिना (नियमोल्लंघन), उचित क्रम में तीन वेदों का अध्ययन किया है अथवा केवल एक का, वह गृहस्थ में प्रवेश करे।
3.4. फ्गुरु की आज्ञा से स्नान करने के पश्चात् और नियमानुसार समावर्तन कर
इस अध्याय को ‘चार आश्रम’ पहेली के साथ पढ़ा जाए। - संपादक