परिशिष्ट- II
255
लिया है, उस द्विज को समान वर्ग की पत्नी से विवाह करना चाहिए जो शुभ चिह्नों से उसे दी जाए।य्
मनु ने जो दूसरा संशोधन किया वह है एक ब्रह्मचारी के संन्यास आश्रम में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना। मनु ने संन्यास से पूर्व विवाह की शर्त लगा दी है। उन्होंने घोषित किया है कि गृहस्थ में प्रवेश किए बिना संन्यास ग्रहण करना एक पाप है।
6.35. फ्जब वह तीनों ऋणों से उऋण हो जाता है तो मोक्ष के लिए सुरति लगाए जो उऋण हुए बिना मुक्ति चाहता है उसका पतन होता।य्
6.36. फ्नियमानुसार वेदाध्ययन, पवित्र विधानानुसार पुत्रवान होकर, योग्यतानुसार यज्ञ करके, वह अपना ध्यान मोक्ष पर लगाए।य्
6.37. कोई द्विज जो वेदाध्ययन बिना, पुत्रवान हुए बिना यज्ञ के बिना मोक्ष चाहता है वह नरक को जाता है।य्
6.38. फ्जिसमें समस्त सम्पत्ति को दक्षिणा रूप में देते हैं ऐसे प्राजापत्य यज्ञ को अनुष्ठान कर और उसमें कथित विधि से अपने में अग्नि का आरोप कर ब्राह्मण घर से संन्यास आश्रम को ग्रहण करे।य्
मनु ने तीसरा संशोधन जो किया, वह यह है कि एक गृहस्थ बिना वानप्रस्थ में प्रवेश किये बिना संन्यासी नहीं हो सकता।
6.1. फ्ब्रह्मचर्याश्रम के बाद समावर्तन संस्कार को प्राप्त स्नातक द्विज इस प्रकार विधिपूर्वक गृहस्थाश्रम में रहकर आगे कथित नियम से जितेन्द्रिय होकर वन में निवास करे।य्
6.2. फ्जब गृहस्थाश्रमी झुर्रियोंदार त्वचा, पके हुए बाल तथा अपने पुत्रों के पुत्र को देख ले तब वन का आश्रय करे।य्
6.3. फ्ग्राम्य आहार तथा परिच्छद को छोड़कर, अपनी पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंप कर अथवा साथ जाने की इच्छा करने वाली अपनी पत्नी को साथ लेकर वन को जावे।य्
मनु ने जो संशोधन किए, वे वास्तव में अत्यंत क्रांतिकारी थे, उन नियमों में जो उनसे पूर्व प्रचलित थे। इस संबंध में हम केवल दो प्रासंगिक नियमों का उल्लेख करेंगे, जो दो धर्म सूत्रों वशिष्ठ धर्मसूत्र और गौतम धर्मसूत्र में हैं।
वशिष्ठ धर्मसूत्र का ख्1, कथन हैः
- अध्याय 7, श्लोक 1, 2, 3