परिशिष्ट-II: अनिवार्य वैवाहिक व्यवस्था - Page 271

256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्चार सोपान हैंः विद्यार्थी, गृहस्थ, वैखानस और तापस।य्

फ्जिस व्यक्ति ने एक दो अथवा तीन वेदों का अध्ययन विद्यार्थी धर्म का उल्लंघन किए बिना किया है, वह जिस आश्रम में जीवन बिताना चाहे, बिता सकता है।य्

गौतम धर्मसूत्र ख्1, के अनुसारः

फ्कुछ (कहते हैं कि) वह (जिसने वेदों का अध्ययन किया है) अपनी इच्छानुसार (किस) अवस्था में रहना चाहता है (इसका वरण कर सकता है)। (चार अवस्थाएं है।) विद्याध्ययन, गृहस्थ, भिक्षु या वैखानस।य्

जैसा कि दो धर्म सूत्रों से स्पष्ट है, यह चयन करना किसी व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर है कि वह ब्रह्मचर्य धर्म निभाने के पश्चात् किस आश्रम में जाना चाहता है। यदि वह चाहे तो विवाह कर सकता है और गृहस्थ बन सकता है अथवा बिना विवाह किए वह सीधे संन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता है। मनु ने वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम से पूर्व अनिवार्य गृहस्थ का निर्देश देकर सचमुच क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, यह स्पष्ट है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मनु ने एक अन्य परिवर्तन भी किया है। यह समझ नहीं आता कि गृहस्थ के पश्चात् संन्यास ग्रहण करने से पूर्व वानप्रस्थ की क्या आवश्यकता है? कोई व्यक्ति सीधे ही संन्यासी क्यों नहीं बन सकता? क्या वानप्रस्थ और संन्यास के बीच कोई ऐसा अंतर है जिसे मूलभूत कहा जा सके? इस अध्ययन के प्रकरण में हमने मनु के द्वारा वानप्रस्थ और संन्यासी के लिए बनाई गई संहिता का संग्रह किया है। इन नियमों पर दृष्टिगत करने से पता चलता है कि उनमें कठिनता से ही कोई भिन्नता है। इसको छोड़कर, कि वानप्रस्थ को कुछ धर्म-कर्म करने पड़ते हैं जिनकी व्यवस्था गृहस्थी के लिए है, दोनों आश्रमों के बीच कोई ठोस अंतर नहीं है। साथ ही यह भी सत्य है कि वानप्रस्थ और संन्यासी के समान प्रयोजन हैं। मनु के निम्नांकित उल्लेख से पता चल जाएगा, उनमें कैसा साम्य है।

परम प्राप्ति लक्ष्य

वानप्रस्थ संन्यासी

6.29. जो ब्राह्मण वन में रहता है 6.85. फ्उपरोक्त नियमों का पालन

इन तथा अन्य धार्मिक कार्यों का कर कोई द्विज पाप से मुक्त हो

परमात्मा से पूर्ण एकाकार हेतु जाता है और परमब्रह्म को प्राप्त

पालन करे, विभिन्न धार्मिक होता है।

विषयों का अध्ययन करे जो

उपनिषदों में समाहित हैं।

  1. अध्याय 3, श्लोक 1 और 2