परिशिष्ट- II
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फिर मनु ने गृहस्थ और संन्यास के मध्य वानप्रस्थ की रचना क्यों कर डाली? वानप्रस्थ के विषय में यह कहा जा सकता है कि यह स्थिति मनु से पूर्व विद्यमान थी। वे अरण कहलाते थे। प्रोफेसर राधा कुमुद मुकर्जी ख्1, के अनुसारः
उन ब्रह्मचारियों को अरण अथवा अरण्यन कहा जाता था, जो ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा में अविवाहित रहना चाहते थे। ये अरण गांव के बाहर आबादी से दूर वैखानस के रूप में वनों में रहते थे। वह जंगल जहां अरण तापस रहते थे, अरण्य कहलाते थे। इन तापसों की दार्शनिक जिज्ञासा परम समस्याओं पर थी जैसे ब्रह्म, सृष्टि, आत्मा अथवा अमरता।
प्राचीन अरण को मनु ने वानप्रस्थ का नाम दे दिया जिसका अर्थ अरण ही है। मनु ने न केवल नाम ही बदला, उन्होंने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन और कर दिया। उन्होंने ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ के मध्य में वैवाहिक अवस्था डाल दी जबकि मूल वानप्रस्थ अथवा अरण भी अविवाहितों के लिए थी, मनु का वानप्रस्थ अनिवार्यतः विवाहित के लिए है। प्राचीन अवस्था में ब्रह्मचारी स्वेच्छा से वानप्रस्थ अथवा गृहस्थ बन सकता था। मनु ने क्रम बदल दिया, जिससे कि कोई बिना विवाह किए वानप्रस्थ न बन जाए।
प्राचीन व्यवस्था के अनुसार वानप्रस्थ अथवा संन्यासी अपनी पत्नी अथवा संतान के साथ कोई कठोरता नहीं बरतते थे। मनु की नई व्यवस्था से यह आरम्भ हो गया क्योंकि पहले तो किसी को विवाह के लिए विवश किया जाए और फिर उसे अपनी पत्नी को त्यागने की अनुमति दे दी जाए। यदि यह अपराध नहीं है तो अत्याचार तो है ही। परन्तु मनु ने इसकी कोई परवाह नहीं की। वह तो सभी के लिए वैवाहिक अवस्था निर्धारण पर तुले थे।
मनु ने ऐसा क्यों किया? उन्होंने वानप्रस्थ और संन्यासियों के लिए गृहस्थाश्रम की अनिवार्यता क्यों रखी? मनु ने सभी आश्रमों में गृहस्थ को श्रेष्ठ बताया है। वे कहते हैंः
6.87. फ्विद्यार्थी, गृहस्थ, वैखानस और तापस-इनकी चार स्थितियां हैं इन सबका उद्गम गृहस्थ है।य्
6.88. फ्किन्तु सभी (अथवा) इनमें से कोई (एक), अवस्था भी जिसका उत्तरोत्तर एवं पवित्र विधानानुकूल पालन किया गया है ब्राह्मण को उच्च स्थिति प्रदान करती है।’’
- एजूकेशन इन एंशिएंट इंडिया, पृ. 6