परिशिष्ट-II: अनिवार्य वैवाहिक व्यवस्था - Page 274

परिशिष्ट- II

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अपने अंतिम लक्ष्य का न परित्याग करने वाला, स्थिर बुद्धि वाला, ब्रह्म करता है और न परित्यक्त होता है।य् का मनन करने वाला, ब्रह्म में ही

भाव रखने वाला संन्यासी

भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करे।य्

III. जीवन-चर्या के नियम

वानप्रस्थ संन्यासी

6.6. फ्वह चर्म अथवा गूदड़ पहने। 6.44. फ्एक खपरा, पेड़ों की जड़ वह प्रातः अथवा संध्या को स्नान या वृक्ष का वक्कल, फटा-पुराना करे। वह सदा शिखा रखे। उसकी कपड़ा, अकेलापन, ममता और सब दाढ़ी, उसके देह के बाल और में समान भाव ये मुक्ति के लक्षण नख न काटे जाएं।य् हैं।य्

6.52. फ्उसके बाल, नाखून और

दाढ़ी-मूंछ कटे हों, भिक्षापात्र, दण्ड-

कमण्डल को लिए हुए सभी प्राणियों

को पीडि़त न करता हुआ वह

आत्मसंयमी सर्वदा विचरण करे।य्

6.53. फ्उसके भिक्षापात्र धातु के न

हों, वे छिद्र रहित हों, उनकी शुद्धि

यज्ञ में यमस के समान केवल पानी

से होती है।य्

6.54. फ्तुम्बा, काष्ठ पात्र, मिट्टी

के सकोरे या बांस की खप्पचियों से

निर्मित पात्र संन्यासी के योग्य होते हैं।

ऐसा स्वायंभुव पुत्र मनु ने कहा है।य्

IV. जीवन-यापन संबंधी नियम

वानप्रस्थ संन्यासी

6.11. फ्वह यज्ञ के लिए पुरोदस 6.49. फ्आत्मा संबंधी प्रसंगों से और उबले आहार (कारु) नियमानुसार आनन्दित हो योगमुद्रा में बैठे, बाह्य तैयार करे, तापसों के अनुकूल शुद्ध सहायता से मुक्त, इन्द्रिय सुख से अन्न एकत्र करे जो वसंत और शरद अनिच्छुक, स्वयं संगी जीवन मोक्ष ऋतु में उगता है।य् के परमानंद का इच्छुक रहे।य्