परिशिष्ट-II: अनिवार्य वैवाहिक व्यवस्था - Page 275

260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

6.12. फ्प्रस्तुत किए जाने पर अत्यंत 6.50. फ्चमत्कार प्रदर्शन, शकुन शुद्ध यज्ञ खाद्य प्राप्त करे जो वन्य ज्ञान, ज्योतिष अथवा हस्त-रेखा ज्ञान पदार्थों से बना हो, बचे हुए पदार्थ से परामर्श देकर और शास्त्रों की वह नमक मिलाकर स्वयं खाए।य् व्याख्या करके कभी भिक्षा न ले।य्

6.26. फ्पदार्थों की प्राप्ति हेतु प्रयास 6.51. फ्(भिक्षा के अभिप्रास से) न करे जो सुखद है। धरती पर बिन वह उस घर के निकट न जाए जहां बिछौने सोए, कोई छाया न भोगे, साधू, ब्राह्मण, पक्षी, श्वान अथवा वृक्ष की जड़ में रहें।य् अन्य भिक्षुक हो।य्

6.27. फ्तापस रूप में रह रहे ब्राह्मणों

से इतनी ही भिक्षा ले जो जीवन-यापन

हेतु पर्याप्त है अथवा वनवासी द्विज

गृहस्थों से भिक्षा ले।य्

6.28. फ्अथवा (वनवासी वैखानस)

गांव से भोजन लाए, उसे या तो दोने

में अथवा अंजलि में या मिट्टी के

बर्तन में मात्र आठ ग्रास खाए।य्

V. भोजन संबंधी नियम

वानप्रस्थ संन्यासी 6.13. फ्उसका आहार हो शुष्क भूमि 6.55. फ्वह दिन में एक बार ही अथवा जल में उगे पदार्थ फल भिक्षाटन करे, भिक्षा में अधिक फूल, कंद मूल, शुद्ध वृक्षों के उत्पाद मात्रा में पदार्थ की कामना न करे और अन्य फलों से निकला तेल।’’ क्योंकि यदि तापस भिक्षा के लिए

आतुर है तो वह इंद्रिय सुख का

इच्छुक माना जाता है।य् 6.14. फ्वह शहद, मांस और 6.56. फ्जब रसोई से धुआं उठना कुकुरमुत्ता न खाए चाहे वह भूमि बंद हो जाए, जब चूल्हा बुझ जाए, पर उपजा हो (या अन्यत्र) भूस्तृण, जब लोग भोजन से निवृत्त हो जाएं, सिगरुक और श्लेशमंतक नामक फल जब जूठन फैंक दी जाए, तो तापस न खाए।य् भिक्षा को जाए।य् 6.15. फ्आश्विन मास में वह तापसों 6.57. फ्खाली हाथ लौट आने पर का भोजन फेंक दे जो वह संग्रह वह दुखी न हो, न ही प्राप्ति पर