परिशिष्ट-II: अनिवार्य वैवाहिक व्यवस्था - Page 276

परिशिष्ट- II

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करता है, उसी प्रकार अपने पुराने प्रसन्न। वह इतना ही प्राप्त करे जो वस्त्र, शाक-मूल और फल फेंक जीने के लिए आवश्यक है। वह दे।य् अपने बर्तनों (की गुणवत्ता) का

ध्यान न रखे।य्

6.16. फ् वह हल चलाई गई धरती 6.58. फ्वह सभी भोजन को तिरस्कार से अपने पदार्थ न खाए चाहे वे कर दे जो विनम्र अभिवादन के साथ किसी ने फेंक दिए हों। ना ही प्राप्त हो (क्योंकि) जो तापस पूर्ण गांव में उगने वाले मूल और फल बंधनमुक्त है, वह बाध्य है कि विनम्र चाहे (भूख से) व्याकुल भी हो।य् अभिवादन से भोजन न ले।’’

6.17. फ्वह अग्नि से पका भोजन

अथवा समय पर पके फल ही खाए

या वह पत्थर पर रगड़कर या दांत

से काटकर ही खाए।य्

6.18. फ्वह अपने दैनिक भोजन के

उपरांत अपना भिक्षापात्र स्वच्छ करे

अथवा एक मास के लिए पर्याप्त

अथवा छह मास अथवा एक वर्ष

के लिए संग्रह करे।य्

6.19. फ्अपनी क्षमतानुसार भोजन

एकत्र करके या तो रात्रि में (केवल)

अथवा (दिन में) (केवल) अथवा

चौथे समय अथवा आठवें समय

भोजन करे।य्

6.20. फ्अथवा वह चंद्रायण के

अनुसार शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण

पक्ष में अपने भोजन की मात्रा

प्रतिदिन घटाए अथवा प्रत्येक पक्ष

के अंतिम दिन एक बार ही जौ

का दलिया खाए।य्

6.21. फ्अथवा वह वैखानस के लिए

निर्धारित नियमानुसार सतत फूलों,