इक्कीसवीं पहेली: मन्वतर का सिद्धांत - Page 284

इक्कीसवीं पहेली

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वर्तमान सातवें मन्वंतर के मनु अन्त्येष्टि देव, सूर्य की अनुपम संतान वैवस्वत हैं और उनके देवता हैं आदित्य, वसु और रुद्र। उनका इन्द्र पुरन्दर सप्तर्षि है।

वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, और भारद्वाज। वैवस्वत मनु के नौ धर्मनिष्ठ पुत्र हैं राजा इक्ष्वाकु, नाभानिदिष्ट, करुष, पृषध्र और वसुमत।य्

अभी सात मन्वंतरों का विवरण दिया गया है जो विष्णु पुराण में उल्लिखित हैं। ये विष्णु पुराण लिखे जाने तक की स्थिति थी। क्या मन्वंतर शासन बाह्य था? इस विषय में ब्राह्मण मौन हैं। परन्तु विष्णु पुराण के लेखक को पता है कि सात मन्वंतर अभी और आने हैं। इनका विवरण इस प्रकार हैः

फ्विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा सूर्य की पत्नी थी, उसकी तीन संतानें हुई- मनु (वैवस्वत) यम और यमी (अथवा यमुना)_ अपने पति का तेज झेलने में असमर्थ संज्ञा ने उसे छाया दे दी और स्वयं उपासना के लिए वनों में चली गई। सूर्य ने छाया को अपनी पत्नी संज्ञा जान कर उससे तीन संतान और उत्पन्न कीं। शनिश्चर (शनि), मनु (सावर्णी) और पुत्री ताप्ती (ताप्ती नदी)। छाया को एक बार यम पर क्रोध आ गया। उसने उसे शाप दिया साथ ही उसने यम को और सूर्य को यह भी बता दिया कि वह वास्तविक संज्ञा नहीं है। छाया के यह बताने पर कि उसकी पत्नी जंगलों में चली गई है सूर्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा कि वह घोड़ी रूप में तपस्यारत है (अश्वी), सूर्य ने घोड़े के रूप में पुनर्जन्म ले लिया था और अश्वरूपिणी अपनी पत्नी के पास पहुंच गया। और उससे तीन अन्य संतानें उत्पन्न कीं। दो आश्विन और रैवत थीं। फिर संज्ञा को घर ले गया। विश्वकर्मा ने सूर्य (नक्षत्र) की गहनता कम करने और उसकी दीप्ति घटाने के उद्देश्य से अपनी चक्री पर चढ़ाया और उसे घिस कर आठवां भाग कर दिया क्योंकि इससे अधिक अविभाज्य था। जो दैवी वैष्णव भव्यता सूर्य में थी, वह विश्वकर्मा के घिसने से धरती पर गिरी। शिल्पकार (विश्वकर्मा) ने विष्णु का चक्र, शिव का त्रिशूल, कुबेर का शस्त्र और कार्त्तिकेय का वेलु बनाया और अन्य देवों अन्य देवों के शस्त्रों का निर्माण किया। विश्वकर्मा ने इन सबका निर्माण सूर्य की तेजोपम किरणों से किया।य्

फ्छाया का पुत्र, जो मनु कहलाता था, उसी वर्ण का होने के कारण उसका दूसरा नाम सावर्णी पड़ा। जैसा कि उसके बड़े भाई मनु वैवस्वत का था। वह आठवें मन्वंतर का मनु है। अब मैं उसका विवरण निम्न बातों के साथ देता हूं। जिस काल में सावर्णी मनु बनेंगे, उनके देवगण होंगे सुतप, अभिताभास और मुख्य तथा प्रत्येक के 21 देवगण होंगे तथा सप्तऋषि इस प्रकार होंगेः दीप्तिमत, गालव, राम, कृप और द्रोणि। मेरा पुत्र व्यास छठा और ऋष्यऋंग सातवां ऋषि होगा। इस युग का इन्द्र बलि