इक्कीसवीं पहेली
केवल मनुस्मृति से ही प्राप्त होता है।
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मनुस्मृति के प्रथम अध्याय से यह उत्तर मिलता हैः
ऋषिगण मनु के पास गए जो एकाग्रचित्त बैठे थे_ उनकी समुचित उपासना करके उन्होंने ऐसा कहाः
देव हमें साररूप में उचित क्रम में चारों (मुख्य) वर्णों और मध्यवर्तियों के लिए पवित्र विधान बताएं।
क्योंकि, हे देव! केवल आपको ज्ञात है कि स्वायंभुव (मनु) ने क्या अनुष्ठान और आत्मा के ज्ञान का उपदेश किया है जो ज्ञान और अनुभव के परे हैं।
मनु उन्हें उत्तर देते हैंः
यह ब्रह्मांड अंधकारमय अदृश्य था। इसका कोई आकार नहीं था। पहचान नहीं थी। न इसे समझा जा सकता था, न इसे जाना जा सकता था क्योंकि यह गहरी निद्रा में सुप्त था।
स्वायंभुव मनु ने सोचा मैं एक से अनेक होऊं। उन्होंने सर्वप्रथम जल की रचना की और उसमें बीज डाल दिया।
वह (बीज) एक स्वर्णिम अण्डज बन गया। दीप्ति में सूर्य के समान इसी अण्डे से वह स्वयं ब्रह्मा जन्मे, समस्त सृष्टि के रचयिता।
तब मैंने सृष्टि रचना के लिए कठोर तप किया। इसके पश्चात् दस महान ऋषियों को बनाया जो सृष्टि के स्वामी थे।
मारीचि, अत्रि, आंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेतस, वशिष्ठ भृगु और नारद को रचा।
परन्तु उसने पवित्र विधान का सम्पादन कर उन्हें दीक्षित किया। स्वयं उन्हें सिखाया, शास्त्रानुसार आरंभ में मात्र मुझे ही, फिर मैंने वे (विधान) मारीचि और अन्य ऋषियों को बताए।
भृगु ये विधान तुम्हें बताएंगे क्योंकि उस ऋषि ने सम्पूर्ण रूप में पूर्णता से मुझसे सीखा है।य्
इससे यह प्रकट होता है कि केवल मनु ने विधान बनाया। जो स्वायंभुव मनु था। विष्णु पुराण के अनुसार प्रत्येक मन्वंतर का एक मनु है। उन्होंने अपने मन्वंतरों के लिए विधान क्यों नहीं चाहिए? अथवा स्वायंभुव मनु का बनाया विधान शाश्वत है। यदि ऐसा है तो ब्राह्मणों ने अलग मन्वंतर क्यों बनाए?