274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हो सकती है। यदि किसी समाज के सदस्य जातियों अथवा वर्गों में बंटे होंगे और एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं रखेंगे और जहां प्रत्येक व्यक्ति की आस्था पहले उसके अपने वर्ग के प्रति है तो यह जातिवाद अथवा वर्गवादी बन जाता है और अपने वर्ग के हितों को सबसे ऊपर रखकर चलेगा और अपने अधिकारों का प्रयोग कानून और न्याय को विकृत करके अपने वर्ग के हित-संवर्धन में लगायेगा और इस उद्देश्य से उन लोगों के प्रति जीवन के हर क्षेत्र में नियोजित रूप से भेदभाव बरतेगा जो उसके वर्ग से सम्बद्ध नहीं हैं तो प्रजातांत्रिक सरकार क्या कर लेगी? उस समाज में जहां विभिन्न वर्गों के बीच संघर्ष होता है और समाज विरोधी गतिविधियां और आक्रामक भावना पनपती हैं वहां की सरकार न्याय और निष्पक्षता से अपना कार्य नहीं कर सकती। ऐसे समाज में यदि सरकार लोगों की है और लोगों द्वारा बनाई भी गयी है किन्तु वह लोगों के लिए नहीं हो सकती। यह एक वर्ग की और एक वर्ग के लिए है। लोगों के लिए सरकार वही हो सकती है जहां प्रत्येक नागरिक का व्यवहार प्रजातांत्रिक है। इसका अर्थ है जहां प्रत्येक नागरिक अन्य सभी नागरिकों को समान समझने के लिए तैयार है_ उतनी ही स्वतंत्रता देने के लिए तैयार है जितनी स्वयं चाहता है। प्रजातांत्रिक मानसिकता से एक प्रजातांत्रिक समाज में व्यक्ति का समाजीकरण हो जाता है। प्रजातांत्रिक सरकारों का पतन आमतौर से इस कारण हुआ है कि जिस समाज के लिए वे बनीं, वह समाज ही प्रजातांत्रिक नहीं था।
दुर्भाग्य से इस बात का अहसास ही नहीं किया जाता कि अच्छी सरकार अपने समाज की मानसिक और नैतिक प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। प्रजातंत्र एक राजनीतिक तंत्र से आगे भी कुछ है। यह एक सामाजिक प्रणाली से भी आगे है। यह मस्तिष्क की प्रवृत्ति और जीवन-दर्शन है।
कुछ लोग प्रजातंत्र की बराबरी समानता और स्वतंत्रता से करते हैं। इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि गहनता से प्रजातंत्र की अन्तरात्मा ही समानता और स्वतंत्रता है। परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि समानता और स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रह सकती है। कुछ व्यक्ति कह सकते हैं कि सरकार कानून, समानता और स्वतंत्रता की रक्षक होती है। यह सही जवाब नहीं है। समानता और स्वतंत्रता सहभावना से आती है जैसा कि फ्रांस की राज्यक्रांति के कर्णधारों ने उसे भ्रातृत्व कहा। भ्रातृत्व अपने में सम्यक अभिव्यक्ति नहीं है। बुद्ध ने सम्यक के लिए सही शब्द ‘मैत्री’ कहा है। इससे पता चलेगा कि हिन्दू धर्म में और दर्शन में भ्रातृत्व का सिद्धांत ही अज्ञात है। पर निष्कर्ष ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता। हिन्दुओं के धार्मिक और दार्शनिक विचारों की