बाईसवीं पहेली
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एक विचारधारा में भ्रातृत्व-भाव से भी बढ़कर सामाजिक प्रजातंत्र था, यह विचारधारा थी ब्रह्म-दर्शन ख्1, ।
यदि कोई पूछे कि यह ब्रह्म-दर्शन क्या है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हिन्दुओं तक के लिए यह एक नई बात है। हिंदुओं को वेदांत का ज्ञान है। वे ब्राह्मणवाद से परिचित हैं, किन्तु ब्रह्मवाद को नहीं जानते। आगे बढ़ने से पूर्व कुछ विवरण आवश्यक है।
हिंदुओं के दर्शन और धर्म के तीन अंग हैंः वे इस प्रकार हैं -1. ब्रह्मवाद, 2. वेदांत, और 3. ब्राह्मणवाद। यद्यपि उनका परस्पर सम्बन्ध है परन्तु इनकी तीन भिन्न विचारधाराएं और मत हैं। वे हैं-
सर्वम खलविदम् ब्रह्म - सभी कुछ ब्रह्म है।
अहं ब्रह्मास्मि - आत्मा ही ब्रह्म है इसलिए मैं ही ब्रह्म हूं।
तत्वामसि - आत्मा और परमात्मा एक हैं। इसलिए तू
भी ब्रह्म है।
ये महावाक्य कहलाते हैं और इन्हीं में ब्रह्मवाद का सार है। निम्नलिखित मतों में वेदांत की शिक्षा का सार है-
ब्रह्म ही सत्य है।
जगत माया अथवा मिथ्या है।
जीव और ब्रह्म का संबंध-
( i ) एक है, ( ii ) एक नहीं है परन्तु आत्मा परमात्मा का अंश है। उससे भिन्न नहीं है, ( iii ) वे भिन्न और भाज्य हैं।
ब्राह्मणवाद का सार इस प्रकार प्रकट किया जा सकता हैः
चातुर्वर्ण्य में विश्वास।
वेदों की पवित्रता और असंदिग्धता।
मुक्ति का मार्ग मात्र यज्ञ।
अधिकांश लोग वेदांत और ब्राह्मणवाद के बीच भेद से परिचित हैं और यह जानते हैं कि उनके बीच मतभेद हैं? किन्तु ब्राह्मणवाद और वेदांत के बीच के भेद को बहुत कम लोग जानते हैं। यहाँ तक कि हिंदू भी ब्राह्मणवाद के सिद्धांत से अवगत
- मैंने यह शब्द प्रोफेसर हॉपकिंस की पुस्तक एपिक्स ऑफ इंडिया से लिया है।