बाइसवीं पहेली: ब्रह्म धर्म नहीं है - ब्रह्मा किस काम का? - Page 291

276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं हैं और न ही इसमें और वेदांत के बीच भेद से परिचित हैं। किन्तु इनके बीच स्पष्ट अंतर है। ब्रह्मवाद और वेदांत के बीच इस बात में सहमति है कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। परन्तु ब्राह्मणवाद जगत को मिथ्या नहीं मानता, वेदांत का विश्वास मिथ्यावाद है। दोनों के बीच यही मौलिक भेद है।

ब्राह्मणवाद का सार है-विश्व सत्य है और विश्व के सत्य के पीछे ब्रह्म है। इसलिए प्रत्येक तत्व का सार ब्रह्म है।

ब्रह्मवाद के विरुद्ध दो प्रकार की आलोचनाएं की जाती हैं। यह कहा जाता है कि ब्रह्मवाद ढिठाई है। क्योंकि यह कहना फ्अहं ब्रह्मस्मिय् एक प्रकार का अभिमान है। इसकी दूसरी आलोचना यह कहकर की जाती है कि कोई व्यक्ति ब्रह्म को नहीं जान सकता। फ्अहं ब्रह्मस्मिय् इसलिए कहना एक गर्वोक्ति है। परन्तु किसी का अपना विश्वास हो सकता है। जिस संसार में मानवता इतने हीन भाव से ग्रस्त है, वहां एक व्यक्ति द्वारा ऐसी घोषणा करना स्वागत योग्य है। प्रजातंत्र का तकाजा है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का अहसास होना चाहिए। यह भी आवश्यकता है कि प्रत्येक व्यक्ति यह समझे कि वह भी अन्य के समान है। जो फ्अहं ब्रह्मस्मिय् का उपहास करते हैं, वे महावाक्य का दूसरा अंश भूल जाते हैं। वह है फ्तत्वामसिय् यदि तत्वामसि को छोड़कर केवल अहं ब्रह्मास्मि कहा जाएगा तो यह हास्यापद होगा। किन्तु तत्वामसि कहने से ब्रह्मवाद पर गर्वोक्ति का आरोप नहीं लग सकता।

यह ठीक है कि ब्रह्म अजेय है। परन्तु इसके बावजूद ब्रह्म के सिद्धांत के कुछ सामाजिक प्रभाव हैं। आश्चर्यजनक रूप से प्रजातंत्र का बीज मंत्र यदि सभी व्यक्ति ब्रह्म का अंश हैं तो सभी समान भी हुए इसलिए उनमें लोकतंत्र के बीज विद्यमान हैं। इस दृष्टिकोण से ब्रह्म अज्ञेय हो सकता है। परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रजातंत्र का जितना बीज रूप ब्रह्म के सिद्धांत में है, उतना अन्यत्र नहीं।

केवल इस बात पर प्रजातंत्र का समर्थन करना एक बहुत कमजोर आधार है कि हम सभी ईश्वर की संतान हैं। इसलिए जब प्रजातंत्र इस आधार को अपनाता है तो उसमें दृढ़ता नहीं आती। परन्तु यह पहचानने और समझने के लिए कि हम सब एक ही तत्व से बने हैं तो इससे प्रजातंत्र में विश्वास के सिवाय अन्य कोई सिद्धांत नहीं बचता। यह मात्र लोकतंत्र का मार्ग नहीं दिखाता वह सबके लिए प्रजातंत्र को अनिवार्य बना देता है।

प्रजातंत्र के संबंध में पश्चिमी विद्वानों ने यह प्रचारित किया है कि प्रजातंत्र का उद्गम या तो ईसाई मत से हुआ है अथवा अफलातून (अरिस्टोटल) से और इसे