बाईसवीं पहेली
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छोड़कर कोई अन्य स्रोत नहीं है। यदि उन्हें यह पता होता कि भारत में ब्रह्मवाद का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ है, जो प्रजातंत्र का बेहतर आधार प्रदान करता है तो वे इतने हठधर्मी न होते। भारत के योगदान को भी प्रजातंत्र का सैद्धांतिक आधार तैयार करने में स्वीकार किया जाना चाहिए।
प्रश्न यह है कि ब्रह्मवाद का यह सिद्धांत क्या है? यह स्पष्ट है कि ब्रह्मवाद का कोई सामाजिक प्रभाव नहीं है। इसे धर्म का आधार नहीं बनाया गया। जब यह पूछा गया कि ऐसा क्यों हुआ? तो उत्तर यही मिला। ब्रह्मवाद तो केवल दर्शन हैं, जैसे कि दर्शन सामाजिक जीवन का प्रतिबिम्ब न होता हो। शून्य में ही रम गया हो। दर्शन केवल सैद्धांतिक ही नहीं होता। यह एक व्यावहारिक सम्भावना है। दर्शनशास्त्र का मूल जीवन की समस्याओं में है और दर्शनशास्त्र से जो सिद्धांत निकलते हैं, वहीं समाज के पुनर्निर्माण के कारक बनकर समाज में आ जाते हैं। केवल जानना ही आवश्यक नहीं है। जो जानते हैं वे इसे पूरा करें।
ब्रह्मवाद नया समाज क्यों नहीं दे पाया? यह एक बड़ी पहेली है। बात यह नहीं है कि ब्राह्मणों ने ब्रह्मवाद को मान्यता नहीं दी। वह तो दी। परन्तु उन्होंने कभी यह भी पूछा कि ब्राह्मण और शूद्र, पुरुष और नारी, छूत-अछूत के बीच विषमता का समर्थन कैसे कर सकते हैं? परन्तु उन्होंने नहीं पूछा। इसका परिणाम यह निकला कि एक ओर तो हमारे सामने शुद्धतम प्रजातांत्रिक ब्रह्मवाद का सिद्धांत है दूसरी और जातियों, उपजातियों, अछूतों, आदिम जातियों, जरायम पेशा जातियों के खानों में बंटा समाज है। क्या इससे बड़ा भी कोई अजूबा हो सकता है? और भी हास्यास्पद बात है महान शंकराचार्य के उपदेश। क्योंकि यह शंकराचार्य ही थे जिन्होंने कहा- एक ब्रह्म हैं, यही सत्य है, वही निरंतर है और उसी शंकराचार्य ने ब्राह्मणवादी समाज की सभी असमानताओं को शिरोधार्य किया। कोई पागल ही ऐसे दो परस्पर विरोधी सिद्धान्तों का प्रतिपादक हो सकता है। सचमुच ब्राह्मण एक गाय के समान है, वह कुछ भी और सब कुछ खा सकता है। जैसा कि एक गाय करती है, और फिर भी ब्राह्मण बनी रहती है।