तेइसवीं पहेली
कलियुग-ब्राह्मणों ने इसे अनन्त क्यों बनाया?
यदि हिन्दुओं में कोई धारणा सर्वाधिक व्याप्त है और जिसके विषय में सभी स्त्री-पुरुष, बूढ़े और जवान, समझदार और गैर-समझदार परिचित हैं, वह है-कलियुग। यह सभी जानते हैं कि आज का युग कलियुग है और वे कलियुग में रह रहे हैं। कलियुग का मनोवैज्ञानिक प्रभाव लोगों के दिमाग में घुसा हुआ है। इसका अर्थर है कि यह अमांगलिक युग है। यह अनैतिक युग है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि ऐसी भावना क्यों पनपी? हमें चार बातों का पता होना चाहिए, वे हैं- 1. कलियुग क्या है?, 2. कलियुग का आरंभ कब हुआ?, 3. कलियुग कब समाप्त होगा?, 4. लोगों में ऐसी धारणा क्यो पनपी?
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प्रथम प्रश्न से आरंभ करते हैं। इसकी विवेचना के उद्देश्य से यह उचित होगा कि सर्वप्रथम हम इसका समास विग्रह करें और अलग से विचार करें। युग का अर्थ क्या है? ऋग्वेद में फ्युगय् का प्रयोग काल, पीढ़ी और जनजाति के अर्थ में किया गया है जैसे कि युगे-युगे (हर युग में), उत्तरयुगानि (भविष्य काल में), उत्तर युगे (बाद के काल में) और पूर्वानि युगानि (पूर्व काल में) आदि अभिव्यक्तियां हैं। यह मानुषी, मानुष, मनुष्य के संबंधय में प्रयुक्त हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ मानव की पीढि़यों से है। इसका एक ही अर्थ है-काल। यह स्थापित करने के अनेक प्रयत्न किए गए हैं कि वैदिक जन फ्युगय् को कितने समय का मानते हैं। युग की व्युत्पत्ति संस्कृत की युज् धातु से है, जिसका अर्थ है, योजित करना और वह अर्थ ज्योतिष में योग के अर्थ में लिया जाता है। प्रो. वेबर का मत है कि युग का समय चन्द्रमा की चार गतियों के बराबर है।
इस अध्याय में 45 टाइप किए हुए पृष्ठ हैं। केवल पहले 9 पृष्ठों पर लेखक की हस्तलिपि में संख्याएं पड़ी हैं। बहरहाल इस अध्याय की सामग्री संपूर्ण है। - संपादक