तेइसवीं पहेली
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इस बात पर प्रो. रंगाचार्य ख्1, ने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि फ्सम्भवतः युग का अर्थ नव चन्द्रमा से एक माह की अवधि है जब सूर्य और चन्द्रमा आमने-सामने होते हैं अर्थात् जब उनका योग होता है।य् अन्य विद्वान इससे सहमत नहीं। उदाहरणार्थ श्याम शास्त्री ख्2, के अनुसार युग एक साधारण वर्ष है जैसा कि स्कन्द पुराण का भाग कहे जाने वाले सेतुमहात्म्य में कहा गया है। इसी सिद्धांत के मत में इसे शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के लिए भी प्रयुक्त किया गया है।
इन सब प्रयत्नों से यह जानने में सहायता नहीं मिलती कि वैदिक जन युग का समय कितना समझते थे?
वैदिकों के अथवा धर्म मीमांसकों के साहित्य में युग के संबंध में कोई यथार्थता नहीं है। ज्योतिषशास्त्रियों (वेदांग ज्योतिष के रचनाकारों) ने इसका अर्थ वैदिकजन से भिन्न एक निश्चित काल के लिए किया है। उनके अनुसार युग का अर्थ है पांच वर्ष का समय चक्र, जिसके अंग इस प्रकार हैं- 1. संवत्सर, 2. परिवत्सर, 3. इद्वत्सर, 4. अनुवत्सर और 5. वत्सर।
अब हम कलि पर आते हैं जो कृत, त्रेता, द्वापर और कलि, चार युगों के चक्र का एक भाग है। ‘कलि’ शब्द का आरम्भ कहां से हुआ। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि का उपयोग विभिनन तीन प्रसंगों में किया गया है। कलि शब्द तथा अन्य शब्दों का सर्वप्रथम प्रयोग जुए के पासों में हुआ करता था।
ऋग्वेद से पता चलता है कि पासों की गोटियां विभीतक वृक्ष के फलों की हुआ करती थीं। यह वृक्ष जायफल के आकार का होता है उसके पांच सपाट रुख होते हैं। बाद में पासे चौकोर बनाए जाने लगे। चारों कोनों पर चार अंक होते थे 4, 3, 2, 1। जिस ओर ‘4’ लिखा होता, वह ‘कृत’ था, 3 वाला त्रेता, 2 वाला द्वापर और 1 की गिनती वाला भाग कलि कहलाता था। श्याम शास्त्री बताते हैं कि किस प्रकार जुआ यज्ञ का अंग बन गया, किस प्रकार यह खेला जाता था? उसका वर्णन ख्2, इस प्रकार हैः
फ्यजमान की गाय ले जाते समय अनेक खिलाड़ी मार्ग में उसके साथ चला करते थे और गाय पर दाव लगाते थे। वे कई दलों में बंटकर जुआ खेला करते थे। दाव के रूप में अनाज जमा कराया करते थे। प्रत्येक खिलाड़ी एक सौ अथवा उससे अधिक कौडि़यां जमीन पर फेंका करता था और इस प्रकार फेंकी गई कौडि़यों में से जब अधिक चित हुआ करती थीं या पट्ट हुआ करती थीं तो दाव के अनुसार उनकी संख्या चार से
युगाजः ए क्वश्चन आफ हिंदू क्रोनोलाजी एण्ड हिस्ट्री, पृ. 19
द्रप्सः दि वैदिक साइकिल आफ एंक्लीप्स्ज, (1938) पृ. 88