280 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विभाजित हो जाती थी तो यजमान जीत जाता था। यदि नहीं तो वह हार जाता था। इस प्रकार जीते गये अनाज से बलि के दिन चार ब्राह्मण जिमाए जाते थे।य्
वैदिक साहित्य के विषय में प्रो. इगलिंग के कथन से इस संबंध में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि आदिकाल से ही जुए का प्रचलन था। यह भी स्पष्ट है कि यह
खेल पांच पासों से खेला जाता था ख्1, । जिनमें से चार कृत और पांचवां कलि कहलाता था। वह ये भी बताते हैं कि खेल कई प्रकार का होता था और सबसे पहला खेल इस प्रकार का होता था कि यदि सारे पासे एक जैसे पड़ते थे तो खिलाड़ी जीत जाता था। जुआ राजसूय के समय और पवित्र अग्नि की स्थापना पर किए जाने वाले यज्ञ के समय भी खेला जाता था।
कृत, त्रेता, द्वापर और कलि शब्दों का गणित में भी प्रयोग किया जाता था। यह भगवती सूत्र पर अभयदेव सूरी की निम्न टीका से स्पष्ट है जो कि जैनधर्म का विशाल ग्रंथ है।
फ्गणित की शब्दावली में सम संख्या युग्म कहलाती थी और विषम संख्या को ओझ कहते हैं। दो संख्याओं को ही युग्म कहा जाना चाहिए और दो को ही ओझ। फिर भी, युग्म शब्द से अर्थ है- चार युग्म अर्थात् चार संख्याएं। उनमें कृत युग्म बनता है। कृत का आशय है सम्पूर्ण। क्योंकि चार के आगे कोई संख्या नहीं है, जिसे अलग नाम दिया जाता हो। (अर्थात् वह नाम कृत आदि) चार नामों से भिन्न है। जो संख्या अपूर्ण है, जैसे त्रियोज और दूसरी संख्याएं और जो विशेष सम संख्या है वह है कृत युग्म। जहां तक त्रियोज का प्रश्न है, ऐसी विषम संख्या है, जो कृतयुग के ऊपर विषम है वह त्रियोज है। जहां तक द्वापरयुग्म का प्रश्न है, वह भी कृतयुग्म की भांति सम संख्या है किंतु उससे भिन्न है जो आरंभ के दो से अथवा कृतयुग्म के ऊपर से आरम्भ होती है। वह द्वापरयुग्म है। द्वापर एक विशेष व्याकरणिक शब्द है। कालयोज वह विषम संख्या है, जो कलि से अविभाज्य है। अर्थात् एक कृतयुग्म के लिए एक कालयोज है। वे संख्याएं, जिन्हें चार से विभाजित किया जा सकता है। और संख्या पूरी तरह विभाजित हो जाती है, तो वह कृतयुग्म है। संख्याओं के क्रम में, यद्यपि चार को चार से विभक्त करने की आवश्यकता नहीं थी। वह स्वयं चार है, फिर भी वह कृतयुग्म कहलाती है।य्
श्याम शास्त्री ख्2, इस शब्दावली को दूसरे आशय से प्रयोग करते हैं। उनके अनुसार, इनका उपयोग पर्व नाम से किया गया है जैसे, कृतपर्व, त्रेतापर्व, द्वापरपर्व और कलिपर्व। एक पर्व 15 तिथियों की अवधि का होता है या यह दिन पक्ष के नाम से पुकारे जाते
शतपथ ब्राह्मण में तत्संबंधी उनकी टिप्पणी देखें, खण्ड 4, पृ. 107
श्याम शास्त्री, द्रप्स, पृ. 92-3