288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्राचीन आर्य स्त्रियां बेची जाती थीं। आर्य विवाह-पद्धति के रूप में पुत्रियों के विक्रय के साक्ष्य उपलब्ध हैं। किसी पिता का पुत्र, किसी स्त्री का जो मूल्य चुकाता था, उसके लिए पारिभाषिक शब्द ‘गो-मिथुन’ प्रचलित था। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि गो-मिथुन के बदले लड़कियाँ बेच दी जाती थीं। ‘गो-मिथुन’ का अर्थ है एक गाय और एक वृषभ जो किसी कन्या का समुचित मूल्य समझा जाता था। न केवल पिता अपनी पुत्रियों को बेचा करते थे बल्कि पति अपनी पत्नियां भी बेच दिया करते थे। हरिवंश पुराण के 79वें अध्याय में इस बात का जिक्र है कि एक अनुष्ठान पुण्यक व्रत में यज्ञ करने वाले पुरोहित को शुल्क क्यों दिया जाए। इसमें कहा गया है कि ब्राह्मणों की पत्नियां उनके पतियों से खरीद ली जाएं और पुरोहित को उसके दक्षिणा के रूप में दे दिया जाए। इससे यह स्पष्ट है कि ब्राह्मण बेझिझक अपनी पत्नियां बेचते थे।
यह भी सत्य है कि प्राचीन आर्य अपनी स्त्रियों को दूसरों को सहवास के लिए किराये पर दे दिया करते थे। महाभारत के अध्याय 103 से 123 में माधवी के जीवन का उल्लेख है। इस आख्यान के अनुसार माधवी राजा ययाति की पुत्री थी। ययाति ने उसे गालव को उपहार में दे दिया था जो एक ऋषि था। गालव ने उसे एक के बाद एक तीन राजाओं को क्रमशः सहवास और पुत्र प्राप्ति हेतु दे दिया। जब तीसरे राजा की भोग की अवधि समाप्त हो गई तो गालव ने माधवी को अपने गुरु विश्वामित्र को सहवास के लिए दे दिया जिसको उन्होंने अपनी पत्नी बना लिया और तब तक उसे अपने पास रखा, जब तक उन्हें एक पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। इसके उपरांत विश्वामित्र ने उसे गालव को लौटा दिया। अंत में गालव ने उसे उसके पिता ययाति को वापस दे दिया।
प्राचीन आर्य समुदाय में बहुपतित्व और बहुपत्नीत्व दोनों प्रथाएँ प्रचलित थीं। उदाहरण इतने अधिक हैं कि उनको प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है। परन्तु शायद जिसका लोगों को पूरी तरह पता नहीं है, वह तथ्य था- स्वच्छंद संभोग। स्वच्छंद संभोग उस स्थिति में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है जब हम नियोग-प्रथा पर विचार करते हैं। नियोग-प्रणाली जिसे आर्यों ने प्रथा का रूप दे दिया, जिसमें कोई स्त्री विवाहित पति के अतिरिक्त, किसी अन्य व्यक्ति से नियोग (सहवास) से संतान प्राप्त (उत्पन्न) कर सकती थी। इस प्रणाली के कारण समाज में संभोग की पूरी स्वच्छंदता थी, क्योंकि उस पर कोई नियंत्रण नहीं था। पहले तो इस पर कोई सीमा नहीं थी कि किसी स्त्री से कितने नियोग कराए जाएं। माधुरी को नियोग की अनुमति थी। अम्बिका ने एक वास्तविक नियोग कराया और दूसरे की इच्छा प्रकट की। सरदनंदिनी के साथ तीन बार नियोग हुआ। पाण्डु ने अपनी पत्नी कुंती को चार नियोगों की आज्ञा दी। व्युसिसताश्व को सात की आज्ञा थी और बलि के विषय में लिखा है कि उसने 17 बार नियोग की आज्ञा प्रदान की। इनमें से 11 एक पत्नी वे साथ और 6 दूसरी के साथ। जैसे नियोगों की संख्या पर कोई सीमा नहीं थी, वैसे ही इसकी भी कोई परिभाषा नहीं थी कि