तेईसवीं पहेली: कलियुग - ब्राह्मणों ने इसे अनंत क्यों बनाया? - Page 305

290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किंदम ऋषि ने प्राण त्याग दिए। परन्तु मरने से पूर्व उसने पाण्डु को यह शाप दिया कि जब भी वह अपनी पत्नी से सहवास के लिए उद्यत होगा, उसका तभी प्राणांत हो जाएगा। ऋषि के पशु-मैथुन पर पर्दा डालने के लिए व्यास कहते हैं कि ऋषि और उसकी पत्नी ने संभोग के लिए हिरण और हिरणी का रूप धारण कर रखा था। भारत के प्राचीन धार्मिक साहित्य में मैथुन के अन्य उदाहरण ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं होगी, बशर्ते कोई थोड़ी मेहतन करे।

ऋषियों की एक अन्य घृणास्पद प्रवृति थी-स्त्रियों के साथ खुले में और आम जनता के सम्मुख संभोग करना। महाभारत के आदि पर्व के अध्याय 63 में भी ऐसी ही एक अन्य घटना का प्रसंग है कि ऋषि पराशर ने सत्यवती अर्थात् मत्स्यगंधा के साथ कैसे सहवास किया जो एक मछुआरे की पुत्री थी। व्यास कहते हैं कि उन्होंने

खुले में सबके सामने मैथुन किया। आदि पर्व के अध्याय 104 में भी ऐसी ही एक अन्य घटना का प्रसंग है। जहां कहा गया है कि ऋषि दीर्घतमस ने लोगों के समक्ष संभाग किया। महाभारत में ऐसी अनेक घटनाएं हैं। उन्हें खोदने की आवश्यकता नहीं। ‘अयोनिजा’ शब्द यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है। आम बात क्या थी? अधिकांश हिन्दू जानते हैं कि सीता, द्रौपदी और अन्य प्रमुख नारियों को अयोनिजा कहा जाता है। अयोनिजा का अर्थ है, ऐसा शिशु जिसका गर्भधारण निष्कलंक हो। ‘अयोनि’ का अर्थ व्युत्पत्ति के माध्यम से बताने की कोई आवश्यतकता नहीं। ‘योनि’ का मूल अर्थ गृह है। योनिज का अर्थ है ऐसा शिशु जिसका घर में जन्म हुआ हो। अयोनिजा का अर्थ है ऐसा शिशु जो घर में उत्पन्न न हुआ हो। यद अयोनिजा, यह सही व्युत्पत्ति है तो इससे प्रमाणित होता है कि ऐसा चलन मौजूद था कि सरेआम लोगों के समक्ष संभोग किया जाता था।

छांदोग्य उपनिषद् में ऋषियों की अनैतिकता का एक और साक्ष्य मिलता है। इस उपनिषद के अनुसार लगता है, ऋषियों ने यह नियम बनाया कि यदि कोई यज्ञ कर रहा है और उस समय कोई स्त्री ऋषि से संभोग करना चाहे तो ऋषि यज्ञ अधूरा छोड़कर और किसी एकांत स्थान पर जाने के बजाए यज्ञ-मण्डप में ही सार्वजनिक रूप से उस स्त्री के साथ मैथुन करे। इस अनैतिकता को भी धार्मिक रूप दे दिया गया था जिसे वामदेव व्रत कहते थे। कालांतार में यही वाममार्ग कहलाया।

आर्यों का परमपवित्र साहित्य ऋषियों की नैतिकता दर्शाने में और बढ़कर है, अभी उसका एक पक्ष और बताना है।

लगता है, प्राचीन आर्यों की लालसा होती थी कि उनकी संतति अच्छी उत्पन्न हो और इस इच्छा की पूर्ति के लिए वे अपनी पत्नियों को दूसरों के पास भेजा करते थे, विशेष रूप से ऋषियों के पास, जो आर्यों की दृष्टि में कुलीन सांड थे। ऐसे ऋषियों की