तेईसवीं पहेली: कलियुग - ब्राह्मणों ने इसे अनंत क्यों बनाया? - Page 306

तेइसवीं पहेली

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संख्या बहुत अधिक थी। असल में कुछ ऋषियों ने तो इसे बाकायदा धंधा बना लिया था और वे इतने भाग्यशाली थे कि राजा तक अपनी रानियों को गर्भवती कराने के लिए उनकी शरण में जाया करते थे। अब जरा देवों ख्1, पर भी एक दृष्टिपात डालें।

देवगण शक्तिशाली और अत्यन्त कामुक प्राणी हुआ करते थे। यह एक सुविदित आख्यान है कि इन्द्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार किया। किन्तु आर्य स्त्रियों के साथ उन्होंने कितनी बदकारी की, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। आरम्भ्स से ही देव जाति ने आर्य सम्प्रदाय में अपनी बादशाहत जमा ली थी। इसी कारण इन देवों की हवस मिटाने के लिए आर्य स्त्रियों को वेश्या के स्तर तक गिरा दिया गया था। आर्य इस बात पर गर्व करते थे कि उनकी पत्नी के किसी देव से शारीरिक संबंध हैं और किसी देव ने उसकी पत्नी को गर्भवती बना दिया है। इसका उल्लेख महाभारत और हरिवंश पुराण में है, जब आर्य स्त्रियों को इन्द्र, यम, अग्नि, वायु और अन्य देवों से पुत्र पैदा हुए। इसका उल्लेख इतनी बार है कि इस बात पर अचरज होता है कि कितने बड़े पैमाने पर देवों के आर्यों की स्त्रियों के साथ अवैध संबंध थे।

समय बीतने पर देवों और आर्यों के बीच संबंध स्थायी रूप लेने लगे और लगता है, यह प्रवृत्ति सामंतवाद के रूप में पनपी। देवताओं ने आर्यों से दो अधिकार (लाभ) ख्2, प्राप्त किए।

पहला अधिकार यज्ञ था जो आर्यों द्वारा देवों को समय-समय पर दिये जाने वाले भोज का आयोजन होता था जिसके बदले में देवजाति के लोग राक्षसों से आर्यों की रक्षा करते थे। यज्ञ कुछ नहीं था बल्कि देवों की सामंती बलपूर्वक वसूली होती थी। इसको समझने में यदि भूल हुई है तो इसका कारण यही है कि देवों को एक जाति के स्थान पर भ्रांति से ईश्वर (देवता) समझ लिया गया। आर्यों ने आरम्भ से ही समझने में यह गलती की थी।

देवों की, जो दूसरा अधिकार आर्यों से प्राप्त था, वह यह था कि उन्हें आर्यों की स्त्रियों को भोगने का पूर्व अधिकार था। यह बहुत पहले से आरम्भ हो गया था। ऋग्वेद

  1. पता नहीं, जिन्होंने प्रथम बार संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवाद किया, उन्होंने देवों को देवता क्यों समझ लिया? यह एक भयानक गलती थी, जिससे यह भ्रांति पैदा हुई कि वैदिक साहित्य के परिप्रेक्ष्य में आर्यों के सामाजिक जीवन को ठीक से नहीं समझा जा सका। देव एक जाति का नाम था, यह निर्विवाद है। राक्षस, दैत्य, देव विभिन्न समुदायों के नाम हैं, जैसे कि आर्य और दस्यु, यह भी असंदिग्ध हैं।
  2. क्या देवों और आर्यों के बीच ऐसे संबंध थे जैसे किसी स्वामी के अपनी प्रजा के साथ सामंती स्वभाव के होते हैं, इस बात की अभी छानबीन नहीं की गई है। क्योंकि देवों को मानव समुदाय का नहीं समझा गया। देवगण आर्यों से जो उपहार प्राप्त करते थे, वे वैसे ही थे जैसे स्वामी प्रजा से लेता है।