तेईसवीं पहेली: कलियुग - ब्राह्मणों ने इसे अनंत क्यों बनाया? - Page 307

292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में एक उल्लेख है 10.85.40 जिसके अनुसार आर्यों की स्त्रियों पर पहले सोम, फिर गंधर्व, फिर अग्नि और सबके बाद आर्यों से सहवास करना होता था। प्रत्येक आर्य स्त्री किसी देव की होती थी। किसी आर्य कन्या के किशोरावसा में आने पर उसे किसी देव से सहवास करना होता था। इससे पूर्व कि किसी आर्य कन्या का विवाह हो, उसे देव को भेंट चढ़ाकर शांत करना होता था। आश्वलायन गृह्य सूत्र के खंड सात के प्रथम अध्याय में विवाह-संस्कार का जो वर्णन है, वह इस बात का ज्वलंत प्रमाण है। इस सूत्र का सावधानी और विश्लेषणात्मक दृष्टि से अनुशीलन किया जाए तो पता चलेगा कि विवाह के समय तीन देव होते थे। आर्यमान, वरुण और पूशान। स्पष्ट है कि उनका कन्या पर पहले से ही अधिकार था। पर प्रथम वह यह कार्य करता है कि वह कन्या को एक पत्थर के टुकड़े के पास ले जाता है और उससे कहता है कि ‘‘उस पर’’ पैर रख और पत्थर के समान कठोर बन। शत्रु से मुक्ति पा, शत्रु को पैर के नीचे दबा। इसका अर्थ है वर कन्या को उन तीन देवों के नियंत्रण से मुक्ति के लिए कहता है, जिन्हें वह अपना शत्रु मानता है। देवों को क्रोध आता है और वे वर की ओर बढ़ते हैं। कन्या का भाई बीच में आता है और विवाद सुलझाने का प्रयास करता है। वह क्रुद्ध देवों को भुना अन्न भेंट करता है जिससे कन्या पर से उनके अधिकार का मूल्य चुकाया जा सके। तब भाई-बहन से अंजलि बनाने के लिए कहता है, फिर वह उसकी अंजलि में भुना अन्न भर देता है और उसमें घी डालता है और कन्या से वह तीनों देवों को तीन बार अर्पित करने के लिए कहता है। यह अवदान कहलाता है। जब बहन देवों को अवदान अर्पित करती है तो एक विशेष वचन दोहराता है जिसे जानना महत्वपूर्ण है। वह कहता है, फ्यह कन्या अग्नि के माध्यम से आर्यमान का अवदान अर्पित करती है। आर्यमान इस पर से अपना अधिकार छोड़ दें और वर के अधिकार को बाधित न करें।य् कन्या दो अन्य देवों को भी अलग से अवदान देती है और प्रत्येक बार उसका भाई यह दोहराता है। अवदान के पश्चात् अग्नि की प्रदक्षिणा होती है जो सप्तपदी कहलाती है। इसी के पश्चात् विवाह संबंध वैध और उत्तम माना जाता है। यह सब इतना ज्वलंत है कि आर्यों पर देवों की दासता पर प्रकाश डालता है। साथ ही देवों और आर्यों के चरित्र पतन का भी परिचायक है।

विधि विशेषज्ञ जानते हैं कि हिन्दू विवाह में सप्तपदी नितांत अनिवार्य है और इसके बिना हिन्दू विवाह वैध नहीं होता। परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि हिन्दू विवाह में सप्तपदी का इतना महत्व क्यों है, कारण स्पष्ट है। यह इस बात का प्रतीक है कि देवों ने कन्या पर से अपना पूर्वाधिकार त्याग दिया है, वे अवदान से संतुष्ट हैं और कन्या को मुक्त करने पर सहमत हैं। यदि देव वर को और कन्या को सात पग चलने देते हैं तो यह समझा जाता था कि देवों को मुआवजा स्वीकार है और उनका