तेईसवीं पहेली: कलियुग - ब्राह्मणों ने इसे अनंत क्यों बनाया? - Page 308

तेइसवीं पहेली

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अधिकार समाप्त हो गया है और कन्या दूसरे की पत्नी बन सकती है। सप्तपदी के कोई अन्य अर्थ नहीं हो सकते। सप्तपदी प्रत्येक विवाह में आवश्यक थी, इस बात का द्योतक है कि ऐसी अनैतिकता देवों और आर्यों में किस हद तक मौजूद थी?

कृष्ण के चरित्र पर अलग से प्रकाश डाले बिना अवलोकन सम्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि कलियुग का आरम्भ और कृष्ण का देहांत एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसलिए उनके चरित्र पर विचार करने का महत्व है। कृष्ण का चरित्र अन्यों की तुलना में कैसा है? विस्तृत विवरण अन्य स्थान पर दिए गए हैं। हम यहां कुछेक के बारे में ही चर्चा करेंगे। यादव बहुपत्नीवादी थे। कृष्ण, वृष्णि (यादव परिवार) से संबंधित थे। यादव राजाओं के विषय में बताया गया है कि उनकी बहुपत्नयां और बहुपुत्र थे। यह कलंक कृष्ण पर भी लगा हुआ है। परन्तु यह यादव परिवार और स्वयं कृष्ण के घर में मातृ मैथुन का धब्बा लगा है। यहां यादव परिवार में पिता द्वारा पुत्री से विवाह का वर्णन मत्स्य पुराण में आता है। मत्स्य पुराण के अनुसार कृष्ण के एक पूर्वज राजा तैत्री ने अपनी पुत्री को ही घर में रख लिया था और उससे नल नाम का पुत्र उत्पन्न किया था। कृष्ण का पुत्र साम्ब अपनी मां से सहवास करता था। मत्स्य पुराण बताता है कि किस प्रकार साम्ब अवैध रूप से कृष्ण की पत्नी के साथ रहता था। कृष्ण ने अपने पुत्र साम्ब और पत्नी को क्रोधित होकर शाप दिया था। महाभारत में भी यह प्रकरण है। सत्यभामा ने द्रौपदी से यह भेद जानना चाहा कि पांच पतियों को किस प्रकार नियंत्रण में रखती है। महाभारत के अनुसार द्रौपदी ने सत्यभामा को चेताया कि वह अपने सौतेले पुत्रों के साथ अकेले में न तो बात करे और न उन्हें अकेले में ठहरने दे। यही मत्स्य पुराण में भी साम्ब के प्रसंग में कहा गया है। साम्ब का ही अकेला उदाहरण नहीं है। उसके भाई प्रद्युम्न ने भी अपनी पालक माता और सम्बर की पत्नी मायावती से विवाह कर लिया था।

कृष्ण की मृत्यु के पूर्व आर्यों के समाज की नैतिकता इस प्रकार की थी। इतिहास को निश्चित युगों में विभक्त नहीं किया जा सकता और यह नहीं कहा जा सकता कि कृत युग में जैसी नैतिकता थी, वैसी त्रेता और द्वापर में थी। वह कृष्ण की मृत्यु पर सहसा समाप्त हो गई। यदि हम आर्यों के सुधारों की प्रगति का ध्यान रखें तो पाएंगे कि प्रथम युग कृत में वह निम्नतम थी, उससे कुछ बेहतर त्रेता में और सबसे कम अनैतिकता द्वापर में थी। कलियुग में स्थिति सर्वोत्तम है।

कोई विचारधारा मानव-समाज के मात्र सामान्य विकास से नहीं बनती जैसे कि संसार भर में हम देखते हैं। प्राचीन काल में आर्यों का जो नैतिक पतन था, उन्होंने दृढ़ता से सुधार कर उन सामाजिक दुष्कर्मों को त्याग दिया जिसकी जानकारी इतिहास में मिलती है।