294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सामान्य आर्यों की दृष्टि में देवों और ऋषियों का बहुत सम्मान है और यह नियम है कि हीन कुलीन का अनुसरण करता है। आर्य समुदाय में जो भी अनैतिकता थी, वह इसी का परिणाम थी कि सामान्य आर्यजन ने देवों और ऋषियों के अनैतिक कार्यों की नकल की। अपने समाज को नैतिक अधःपतन से मुक्ति दिलाने के लिए आर्यों के कुछ प्रमुख व्यक्तियों ने अत्यधिक महत्वपूर्ण सुधार लागू किए। उन्होंने घोषित किया कि देवों और ऋषियों के कार्यों का उल्लेख न किया जाए। ख्1, ना ही उन्हें उदाहरण स्वरूप किया जाए। इस प्रकार साहस और दृढ़ता से अनैतिकता के एक कारण तथा उसके स्रोत को समाप्त किया गया।
अन्य सुधार भी निर्णायक थे। महाभारत में दीर्घतमस और श्वेतकेतु नामक दो सुधारकों का उल्लेख है। श्वेतकेतु ने व्यवस्था दी कि विवाह अटूट बंधन है और उसे तोड़ा नहीं जा सकता। दीर्घतमस के दो सुधार हैं। उसने बहुपतित्व पर प्रतिबंध लगाया और घोषित किया कि किसी स्त्री का एक समय केवल एक पति होगा। उसका दूसरा सुधार यह बताया जाता है कि उसने नियोग को विनियोजित किया। उसकी अति महत्वपूर्ण पूर्ति निम्न प्रकार रखी गईः
(1) विधवा का पिता अथवा भाई (अथवा विधवा के पति के) उस गुरु के पास जाएं, जिसने मृतक पति और उसके संबंधियों को शिक्षा दी हो अथवा उनके लिए यज्ञ किया हो और मृत पति के लिए संतान उत्पन्न करने वाला नियत कराएं ख्2, ।
(2) (ए) पति, मृतक अथवा जीवित हो किन्तु उसके पुत्र न हो_
परिवार के सदस्यों के परामर्श से पति के लिए गुरु संतानोत्पत्ति करने वाला नियुक्त करें, 3. वह पति का भाई अथवा सपिण्ड अथवा सगोत्र (गौतम के अनुसार) या सपरिवार अथवा सजातीय हो, 4. नियत पुरुष और विधवा काम-वासना वश नहीं वरन् कर्त्तव्य मानकर सहवास करें, 5. नियत पुरुष अपने शरीर से घी अथवा तेल मले। (नारद स्त्री पुमसा, 82) उससे बात न करे, न चुम्बन करे, न कामकेलि करे,
यह संबंध एक पुत्र के जन्म तक (कुछ के अनुसार दो) तक सीमित रहेगा, 7. विधवा की आयु अपेक्षाकृत कम होनी चाहिए। यह अधिक वय की न हो, बंध्या न हो, ऋतुमती होने का समय समाप्त न हुआ हो अथवा रोगी अथवा गर्भवती न हो। (बौधा ध.सू. II 2.70, नारद, स्त्रीपुमसा 83.84, (8) पुत्र जन्म के उपरांत वे एक दूसरे को ससुर और पुत्रवधू माने, (मनु. 9.62)। यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि
गौतम धर्मसूत्र में नियम निर्धारित है कि ऋषियों के चरित्र को उदाहरण बना कर अनुगमन नहीं किया जा सकता- फ्ना देवा चरितम चरैयतेय्। इससे यह सीमा बांध दी गई है कि देवों के कार्य उदाहरण नहीं बन सकते। यह एक मुक्त श्लोक है जसका स्रोत अज्ञात है।
काणे ग्रंथ, भाग 1, पृ. 60