चौबीसवीं पहेली: कलियुग की पहेली - Page 311

चौबीसवीं पहेली

कलियुग की पहेली

कालगणना की जो इकाईयां हिंदुओं में प्रयुक्त हैं, उनकी ओर लोगों का सम्यक ध्यान नहीं जाता कि उनकी विशिष्टता क्या है? यह ऐसा विषय है जो पुराणों से संबद्ध है। उनके अनुसार काल गणना के पांच माप हैंः 1. वर्ष, 2. युग, 3. महायुग, 4. मन्वंतर और 5. कल्प। हम इन इकाईयों के संबंध में विष्णु पुराण पर आते हैं। वर्ष से आरम्भ करें। विष्णु पुराण ने इसे किस प्रकार गिना हैंः ख्1,

फ्हे ऋषि श्रेष्ठ! पन्द्रह बार पलक झपकने पर एक काष्ठ पूर्ण होता है। तीस कलाओं से एक महूर्त, तीस मुहूर्तों से एक मानवीय दिन और रात। ऐसे तीस दिनों से एक महीना बनता है। उसके दो पक्ष होते हैं, 6 मास से एक आयण (उत्तरायण, दक्षिणायण) बनता है और दो आयणों से एक वर्ष बनता है।य्

विष्णु पुराण में ही एक अन्य स्थान पर यही व्याख्या विस्तार से दी गई हैः ख्2,

पन्द्रह बार पलक झपकने (निमेधों) से एक काष्ठ, तीस काष्ठ से एक कला, तीस कलाओं से एक मुहूर्त (अड़तालीस मिनट), तीस मुहूर्तों से एक दिन और रात, उनका समय चाहे घटता-बढ़ता रहे। यह कहा गया है कि संध्या घटने-बढ़ने की दशा में भी वही रहती है। उसका एक ही मुहूर्त होता है। परन्तु जिस समय सूर्य की परिधि को तीन मुहूर्त के लिए रेखांकित किया जाए, वह मध्यांतर प्रातः कहलाता है जो दिवस का पंचमांश होता है। अगला भाग अर्थात् प्रातः के पश्चात् के तीन मुहूर्त संगव (पूर्वाह्न) होता है। अगले तीन मुहूर्त मध्याह्न होते हैं, उसके पश्चात् के तीन मुहूर्त अपराह्न अथवा संध्या होते हैं और दिन के पन्द्रह मुहूर्तों को पांच समान भागों में विभक्त किया है।

  1. विष्णु पुराण, विल्सन, पृ. 22-3

  2. वही।

रिडल आफ कलियुग का यह दूसरा पाठ है। हमें इसकी कार्बन प्रति मिली है। इसमें लेखक के संशोधन नहीं हैं। यह अध्याय 40 पृष्ठों का है - संपादक