चौबीसवीं पहेली
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तीस-तीस मुहूर्तों के पन्द्रह दिनों से एक पक्ष बनता है चन्द्र पक्ष दो पक्षों से एक मास, दो मास से षट ऋतु की एक ऋतु, तीन ऋतुओं से एक आयण अर्थात् उत्तरायण अथवा दक्षिणायण, और दो आयणों से एक वर्ष बनता है।
विष्णु पुराण में युग की परिकल्पना इस प्रकार की गई हैः ख्1,
फ्बारह हजार दैवी वर्षों (एक मेंं तीन सौ साठ) से चार युग बनते हैं, उनका विवरण इस प्रकार हैः कृत युग में चार हजार दैवी वर्ष, त्रेता में तीन हजार, द्वापर में दो हजार और कलियुग में एक हजार। यह प्रचीन गणना के समान है।य्
फ्प्रत्येक युग से पूर्व एक संध्या होती है। यह कई सौ वर्षों की होती है क्योंकि एक युग में हजार वर्ष होते हैं। युग के पश्चात् संध्यांश आता है। उसकी अवधि भी इतनी ही होती है। संध्या और संध्यांश के बीच युग होता है। जैसे कृत, त्रेता आदि।य्
विष्णु पुराण में समय नापने के लिए महायुग का जिक्र आया है। वह कहता हैः ख्2,
फ्वर्ष में चार प्रकार के महीने होते हैं। जिनकी पांच पहचान हैं और इन सबको मिलाकर एक युग का चक्र बनता है। वर्ष को संवत्सर, इद्त्सर, अनुवत्सर, परिवत्सर और वत्सर, कई नामों से पुकारा जाता है। यह समय युग कहलाता है।य्
महायुग का अर्थ है युग का विस्तार जैसा कि विष्णु पुराण में कहा गया हैः ख्3,
फ्कृत, त्रेता, द्वापर और कलि मिलकर महायुग बनते हैं अथवा चतुर्युग, इस प्रकार के हजार का योग ब्रह्मा का एक दिन होता है।य्
विष्णु पुराण में मन्वंतर की व्याख्या इस प्रकार की गई हैः ख्4,
फ्मध्यांतर मन्वंतर कहलाता है। वह चार युगों का इकहत्तर गुना बड़ा होता है। उसमें कुछ और वर्ष भी होते हैं।य्
कल्प के विषय में विष्णु पुराण में कहा गया हैः
फ्ब्रह्मा का दिन कल्पय्
कुछ अवधि हैं, जिनमें समय का विभाजन किया जाता है। इन अवधियों में कितना समय होता है, यह उल्लेखनीय है।
वर्ष की अवधि सरल है। 365 दिन का ही होता है। युग, महायुग, मन्वंतर और कल्प गिनना टेढ़ी खीर हैं, फिर भी कल्प के विभाजन में युग और महायुग को
विष्णु पुराण, विल्सन, पृ. 23
वही पृ. 23
वही पृ. 23
वही पृ. 24