चौबीसवीं पहेली: कलियुग की पहेली - Page 313

298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

समझना कुछ सरल है अपेक्षाकृत इसके कि कल्प को युगों से गुणा किया जाए। कल्प और महायुग के संबंधों को समझने के लिए हमें 71 महायुगों को जोड़ना होगा जबकि एक महायुग में चार युग होते हैं और एक मन्वंतर 71 महायुगों तथा कुछ वर्षोर्ं का होता है।

इन इकाईयों के आधार पर कालगणना करते समय हम युग को आधार मानकर नहीं चल सकते। क्योंकि युगों का समय तो निश्चित है किन्तु उनमें समानता नहीं है। गणना का आधार महायुग है जिसका समय निर्धारित है।

महायुग में चार युग होते हैं। यथा, 1. कृत, 2. त्रेता, 3. द्वापर, और 4. कलि। प्रत्येक युग का समय निश्चित है। प्रत्येक युग के आगे-पीछे संध्या और संध्यांश होते हैं। उनका समय भी निर्धारित है। विभिन्न युगों का अपना समय और उनके साथ सम्बद्ध संध्या और संध्यांश का समय भिन्न-भिन्न है।

युग समय संध्या संध्यांश योग

कृतयुग ...4000 400 400 4800

त्रेता ...3000 300 300 3600

द्वापर ...2000 200 200 2400

कलि ...1000 100 100 1200

महायुग ... ... ... 12000

महायुगों की यह गणना दैवी वर्षों के आधार पर है अर्थात् ब्रह्मा के 12000 दैवी वर्षों से एक महायुग बनेगा। हिसाब यह है कि मानव का एक वर्ष महायुग के एक दैवी दिन के बराबर है। इस प्रकार मानव वर्षों के आधार महायुग का हिसाब इस प्रकार बैठता है (360 × 12000) = 43,20,000 वर्ष।

71 महायुगों से एक कल्प बनता है। इसका अर्थ है, कल्प का समय हुआ (43,20,000 × 71 = 3,06,72,000)।

मन्वंतर 71 महायुगों तथा कुछ वर्षों का योग है। मन्वंतर का काल कल्प के बराबर बैठता है अर्थात् 3,06,72,000 तथा कुछ और वर्ष। मन्वंतर का समय कल्प से कुछ ज्यादा होता है

वर्ष की परिकल्पना खगोलशास्त्र के अनुरूप है। इसलिए काल-गणना के लिए आवश्यक हैं।

कल्प की परिकल्पना पौराणिक और ब्रह्माण्डोत्पत्ति से सम्बद्ध है और इस विश्वास