चौबीसवीं पहेली
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पर आधारित है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति और अवसान ब्रह्मा द्वारा होते हैं। इन दोनों कालों के बीच का अंतर कल्प कहलाता है। इस पर सर्वप्रथम प्रकाश विष्णु पुराण में डाला गया है। वह इसकी सृष्टि से आरम्भ होता है। इसकी रचना के दो रूप हैंः
- सर्ग अर्थात् प्रकृति से ब्रह्मांड की उत्पत्ति और, 2. प्रति सर्ग अर्थात् मूल तत्वों से हुआ आरम्भिक विकास अथवा अस्थाई विकृतियों के पश्चात् पुर्नोदय। यह दोनों रचनाएं सावधिक हैं परन्तु ब्रह्मा के जीवन अवसान पर पहले का समापन हो जाता है जब न केवल देवतागण अपितु अन्य तत्व भी लुप्त हो जाते हैं। परन्तु ये तत्व पुनः मूल रूप में परिवर्तित होकर उभर आते हैं। उनके साथ तब केवल सूक्ष्म तत्व बचता है, वह प्रति कल्प अथवा ब्रह्मा के दिन घटित होता है। इससे केवल क्षुद्र जीव और निम्न जगत प्रभावित होते हैं। ब्रह्मांड सार ऋषि और देवता-गण अप्रभावित रहते हैं। यह कल्प की अवधारणा है।
मन्वंतर की अवधारणा यदि ऐतिहासिक भी नहीं तो पौराणिक तो है ही। इसका सूत्र है कि ब्रह्मा ने चराचर सृष्टि रची। परन्तु चर की वंश-वृद्धि नहीं हुई तब ब्रह्मा ने नौ मानस पुत्र उत्पन्न किए। परन्तु उनमें कोई आवेग नहीं था। मात्र पवित्र ज्ञान से अभिभूत थे, ब्रह्मांड से विरक्त और प्रजनन के अनिच्छुक। ब्रह्मा को यह देखकर क्षोभ हुआ। तब ब्रह्मा ने स्वयं को प्रथम पुरुष मनु स्वायंभुव और प्रथम नारी शतरूपा में परिवर्तित किया। मनु स्वायंभुव ने शतरूपा का वरण किया। इस प्रकार प्रथम मन्वंतर आरम्भ हुआ जो स्वायंभुव मन्वंतर कहलाया। चौदह मन्वंतरों का विवरण इस प्रकार हैः
फ्तब ब्रह्मा ने सृष्टि पालन हेतु स्वयं को मनु स्वायंभुव बना लिया, अपने वास्तविक रूप के समान अपने नारी भाग से शतरूपा रची, जिसे तपस्या द्वारा पाप से शुद्ध किया जिसे मनु ने अपनी पत्नी बनाया। इन दोनों से दो पुत्र जन्मे, प्रियव्रत और उत्तानपाद। दो पुत्रियां थी प्रसूति और आकूति जो अति सुंदर थीं। प्रसूति का विवाह दक्ष से और आकूति का रुचि प्रजापति से हुआ। आकूति से जुड़वां बच्चे उत्पन्न हुए यज्ञ और दक्षिणा जिन्होंने परस्पर विवाह कर लिया। (भाई-बहन के विवाह का एक और उदाहरण) उनसे बारह पुत्र उत्पन्न हुए। ये दवेता स्वायंभुव मन्वंतर में यम कहलाए।
प्रथम मनु ख्1, स्वायंभुव था फिर स्वारोचिष। इसके उपरांत क्रमशः औतमी, तामस, रैवत, चाक्षुष। यह छै मनु काल कवलित हुए। सातवें, वर्तमान मन्वंतर का मनु सूर्यपुत्र वैवस्वत है।य्
फ्कल्प के आरंभ में स्वायंभुव मनु के समय का मैं वर्णन कर चुका हूं। उनके देवों, ऋषिगण, अन्य महापुरुषों जो उस समय विद्यमान थे उनके साथ। फ्अब मैं स्वारोचिष मनु
- विल्सन, विष्णु पुराण, पृ. 259-64।