302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ग्यारहवें मन्वंतर का मनु धर्म सावर्णी होगा उसके समय प्रमुख देव होंगे विहंगम, कामागम और निर्माणरति_ प्रत्येक की संख्या तीस होगी_ इस न्वंतर का इन्द्र वृष होगा। सप्तर्षि होंगे निश्चर, अग्नितेज व पुशमन, विष्णु, आरुणी, हविष्मान और अनघ पृथ्वी के स्वामी और मनु के पुत्र होंगे, सवर्ण, सर्वधर्म और देवानिक आदि।
बारहवें मन्वंतर में रुद्र का पुत्र सावर्णी मनु होगा_ उस काल का इन्द्र होगा ऋतुधामा। देवों के नाम हैं हरितास, लोहितास, सुमन और सुकर्मा_ प्रत्येक की संख्या पन्द्रह होगी। सप्तर्षि इस प्रकार होंगे-तपस्वी, सुतप, तपोमूर्ति, तपोघ्रिति, तपोद्युति और तपोधन। मनु के मेधावी पुत्र होंगे। देव, उपदेव तथा देवश्रेष्ठ आदि।
तेरहवें मन्वंतर का रौच्य मनु होगा। देव वर्ग होग, सुधमन, सुधर्मन और सुकर्मण_ उनका इन्द्र दिवसपति होगा। सप्तर्षि होंगे निर्मोह, तत्वदर्शन निष्प्रकम्प, निरुत्सुक, धृतिमान, अव्यय और सुतप तथा त्रिसेन, विचित्र तथा अन्य नृप होंगे।
भौत्य चौदहवें मन्वंतर का मनु होगा। शुचि उसका इन्द्र होगा। देवताओं के पांच वर्ग होंगे। चाक्षुष, पवित्र, कनिष्ठ, भ्रजीरास और वैवृद्ध। सप्तर्षि इस प्रकार होंगे। अग्निबाहु, शुचि, शुक्र, मागध, ग्रिधर, युक्त और अजित। मनु के पुत्रों के नाम होंगे उरु, गभीर, गभीरा, बृधन आदि जो इस धरा के शासक होंगे।य्
मन्वंतर की योजना शायद इस इरादे से बनाई गई कि उस काल के लिए कोई सत्ता स्थापित की जा सके। प्रत्येक मन्वंतर में एक स्वामी मनु होता है। पूजा के लिए देव होते हैं, सात ऋषि और एक इन्द्र होता है। विष्णु पुराण में कहा गया हैः ख्1,
फ्विभिन्न वर्गों के देवता और मनु के पुत्र अपने संबंधित मन्वंतरों में आहुतियां प्राप्त करते हैं और उनके वंशज उस काल में पृथ्वी के शासक होते हैं। प्रत्येक मन्वंतर के नियंता होते हैं मनु, सप्तऋषि देवता मनु के पुत्र और इन्द्र होते हैं।य्
परन्तु इसकी क्रम-योजना महायुग कहलाती है जो अत्यधिक जटिल मामला है।
कल्प को महायुग में क्यों विभक्त किया जाए और एक महायुग को चार युगों में क्यों विभाजित किया जाए, जिन्हें, कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग कहते हैं? यह एक पहेली है। यह पुराणों पर आधारित है और हिंदू इतिहास के वास्तविक प्रसंग से विलग है। ऐसा काल के साथ नहीं होता।
पहले तो यह पता नहीं चलता कि युग के समय को इतना असीम विस्तार क्यों दिया गया, जिससे पूरा क्रम मनगढ़ंत और बनावटी लगता है?
- विल्सन, विष्णु पुराण, पृ. 269-70