चौबीसवीं पहेली: कलियुग की पहेली - Page 318

चौबीसवीं पहेली

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ऋग्वेद में ‘युग’ शब्द का उपयोग 38 बार हुआ है। यह काल के रूप में प्रयुक्त हुआ है। साथ ही इसका अर्थ पीढ़ी, जुआ और आदिमजाति भी है। कुछ स्थानों पर यह बहुत संक्षिप्त समय के लिए हुआ है। बहुत से स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह बहुत ही कम अवधि के अर्थ में लिया गया है। कभी-कभी तो युगे-युगे का अर्थ है प्रतिदिन।

दूसरी बात यह है कि चार युगों को सामाजिक नैतिकता के निरंतर पतन से जोड़ा गया है। महाभारत के निम्नांकित अंश से यह अवधारणा स्पष्ट प्रकट होती हैः ख्1,

कृत ऐसा काल है जिसका सदाचार शाश्वत है। इस सर्वश्रेष्ठ युग में प्रत्येक कर्म सम्पन्न (कृत) हो जाता है और कुछ करने को शेष नहीं रह जाता। तब कर्त्तव्य निस्तेज नहीं होते थे। ना ही लोग उत्साहहीन होते थे। यद्यपि कालांतर में (समय के प्रभाव से) यह युग क्षुद्रता की ओर अग्रसर हुआ। उस समय न वहां देवता थे, न दानव, न गंधर्व, यक्ष, राक्षस, ना ही पन्नगगण और ना ही क्रय-विक्रय होता था। वेद, साम, ऋज और यजुस में विभक्त नहीं थे, व्यक्ति प्रयास नहीं करते थे। फल सोचने से ही मिल जाते थे। धर्मपरायणता और सांसारिक त्याग विद्यमान था। आयु के प्रभाव ने न कोई रोग व्यापता था, न ही अंगों में क्षीणता आती थी। उस समय न दुर्भाव था, न विलाप, न दर्प, न प्रपंच, ना ही कोई विवाद था। वहां कोई अवसाद क्योंकर हो सकता था। तब न घृणा थी, न अत्याचार, भय, संताप, ईर्ष्या अथवा वैर-भाव था। इस प्रकार परम ब्रह्म उन योगियों को ज्ञानातीत थे। तब सभी नारायण-सबकी आत्मा धवल थी। ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, सभी में कृत युग के गुण थे। उस समय ऐसे जीव जन्मे थे जो अपने कर्म के प्रति निष्ठावान थे। उनके उद्देश्य, विश्वास, कर्म और ज्ञान एक समान थे। उस काल में जातियां अपने कर्म के अनुसार कर्त्तव्य पालन करती थीं। सबको एक देवता पर अटल विश्वास था और मंत्र एक नियम और एक अनुष्ठान से आबद्ध थे यद्यपि उनके कार्य भिन्न-भिन्न थे। वेद एक ही था। एक ही कर्म करते थे। अपने-अपने लिए निर्धारित चारों कार्य में रत रहते थे, समय के पालक थे परन्तु निष्काम होकर परमात्मा का ध्यान लगाते थे। कृत युग में चारों वर्णों की यह अटल धर्मपरायणता उस युग का लक्षण था और वे परमात में विलीन होते थे। कृत युग तीन गुणों से मुक्त था। अब त्रेता को जानें। इसमें यज्ञ होते थे। धर्मपरायण् ाता का चतुर्धांश क्षीण हो गया। विष्णु का रंग लाल हो गया और जन-साधारण सत्य का पालन करता था और अनुष्ठानों पर निर्भर धर्माचरण करता था। तब बलि होती थी। पवित्र कर्म और विभिन्न अनुष्ठानों से। त्रेता में सामान्यजन कोई उद्देश्य जानकर कार्य करते थे। वे अनुष्ठानों और युद्धों से फल-प्राप्ति चाहते थे। तप-साधना से और

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृ. 144-46