चौबीसवीं पहेली: कलियुग की पहेली - Page 319

304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कर्त्तव्य-बोध से उनका मन फिर गया था। इस युग में उनके अपने कार्यों धर्म-कर्म में निष्ठा थी। द्वापर में धर्म परायणता अर्धांश रह गयी थी। विष्णु पीतवर्ण हो गए और वेदों के चार अंग हो गए। कुछ चारों वेद पढ़ते थे, कुछ तीन ही, कुछ दो, कुछ एक ही, और कुछ तो एक भी नहीं। शास्त्र ऐसे बंट गए, अनुष्ठानों में विविधता आ गई। लोग तप-साधना करते। उपहार पाते और राजसी हो गए थे। किसी एक ही वेद में आस्था बन जाने से उनकी संख्या बढ़ी और सतोगुण की क्षीणता के कारण सत्य पर गिने-चुने लोग ही अटल थे। नर-नारियों से सद्गुण नष्ट हो गए, अनेक रोग, राग और विपत्तियां, उन्हें समय के साथ सताने लगीं, जिनसे वे अत्यधिक त्रस्त हुए और साध ना-मार्ग पर बढ़े। अन्य स्वर्गीय आनन्द की कामना करने लगे और यज्ञों का आयोजन किया। इस प्रकार जब द्वापर आया तो लोगों का धर्माचरण और गिरा। कलियुग में तो वह चतुर्थांश ही रह गया। इस अंधकार युग में विष्णु का रंग काला हा गया। वेद, व्यवहार, धर्मपरायणता, अनुष्ठान, आयोजन लुप्त होने लगे। विपदाएं, रोग, क्लांति, दोष जैसे क्रोधादि निराशा, चिंता, भूख, भय, विद्यमान थे। जैसे-जैसे युग बढ़ा धर्मपरायणता का क्षय होता गया। जब ऐसा हुआ तो मानव का भी ”ास हुआ। जब वे ही रोगी थे, जो प्रेरणाएं उन्हें परिचालित करती थीं, वे भी विकृत हो गईं। युग के ”ास के कारण जो प्रवृत्तियां विकसित हुईं, उनसे मानव के उद्देश्य विफल हो गए। ऐसा कलियुग है जो थोड़े समय रहा। जो चिरायु हैं, वे युग के अनुरूप ही चलते हैंय्।

निःसंदेह, यह आश्चर्यजनक है। इन बातों का प्राचीन वैदिक साहित्य में भी उल्लेख है। कृत, त्रेता, द्वापर और अक्षंद शब्द ऐतरेय ब्राह्मण की तैत्तरीय संहिता तथा शतपथ ब्राह्मण में भी प्रयुक्त हुए हैं। शतपथ ब्राह्मण का कथन है-फ्कृत वह है जब

खेल की गलतियों से लाभ मिलता है, त्रेता वह है जब कोई नियमित योजनानुसार

खेलता है, द्वापर वह है जब कोई सामने वाले खिलाड़ी को पछाड़ने की चाल चलता है। अक्षंद का अर्थ है क्रीड़ास्थल का कीड़ा।य् ऐतरेय ब्राह्मण और तैत्तरीय ब्राह्मण में अक्षंद के स्थान पर ‘कलि’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। तैत्तरीय ब्राह्मण में कृत का अर्थ है जुआघर का स्वामी, त्रेता का अर्थ है-गलतियों से लाभ उठाना, द्वापर अर्थात् बाहर बैठने वाला, कलि का अर्थ है, जो जुआघर को कभी नहीं त्यागता। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया हैः

फ्यहां प्रत्येक सफलता की आशा करता है, आभागी मृत्यु के लिए। कलि लेटा पड़ा है, अन्य दो शनैः शनैः चल रहे हैं। आधे गिर चुके हैं परन्तु सबसे सौभाग्यशाली कृत में पूरी गति है।य् यह स्पष्ट है कि ये सभी शब्द जुए के पासों के लिए हैं।

मनु ने इनका किस प्रकार प्रयोग किया ख्1, है? उसे भी देखा जाए। वे कहते हैंः

  1. मनु. 9, 301-2