तीसरी पहेली
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V
वेदों के संबंध में पुराणों का क्या कहना है, यह भी एक दिलचस्प बात है। विष्णु पुराण ख्1, में कहा गया हैः
‘‘फिर अपने पूर्व मुख से ब्रह्मा ने गायत्री, ऋव्Q, त्रिवृत, सोमरथंतर और अग्निष्टोम
यज्ञों को रचा। दक्षिण मुख से यजु, त्रैष्टुप्छन्द, पंचदशस्तोम, वृहत्साम तथा
उक्थ्य की रचना की। पश्चिम मुख से साम, जगतिछंद, सप्तदशस्तोम, वैरूप और
अतिरात्र को उत्पन्न किया तथा उत्तर मुख से उन्होंने एकविंशतिस्तोम, अथर्ववेद,
आप्तोर्यामण, अनुष्टपछंद और वैराज छंद की सृष्टि की।’’
भागवत पुराण ख्2, में कहा गया हैः
‘‘एक बार जब चतुर्मुख ब्रह्मा के मुख से वेद प्रस्फुटित हुए, वे यह जानने के लिए ध्यान लगा रहे थे कि मैं पहले की भांति सृष्टि का कैसे विस्तार करूं? उन्होंने अपने पूर्व मुख और अन्य मुखों से ऋक, यजुश, साम और अथर्ववेद की रचना की, उसी के साथ प्रशस्ति, यज्ञ, ऋचाएं और प्रायश्चित की भी सृष्टि हुई’’। (मूल रचना में इस स्थान पर कुछ अंश छूटे हुए लगते हैं क्योंकि अगले भाग से उसका तारतम्य नहीं है)।
‘‘ उसकी आंखों में प्रविष्ट होते हुए उससे एक नर चतुष्पद उत्पन्न हुआ जो ब्रह्मा
की तरह कामुक, अवर्णणीय, सनातन, अक्षय, दैहिक संवेदनाओं और गुणों से
रहित था, जो विशिष्ट मेधा से दमक रहा था, चन्द्रमा की किरणों की तरह शुद्ध
था और शब्दों में साकार था। भगवान ने ऋग्वेद की रचना की। उन्होंने अपनी
आंखों से यजुर्वेद को बनाया, जिह्वा के छोर से सामवेद की रचना की और सिर
से अथर्ववेद रचा। अपनी रचना के साथ ही ये वेद क्षेत्र में परिवर्तित हो गए।
फिर उन्हें वेदों के गुरु प्राप्त हुए क्योंकि उन्हें विंदांति प्राप्त हुई। फिर इन वेदों
ने अनादि सनातन ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति की, एक अपने गुणों से सम्पन्न स्वर्गीय
पुरुष की रचना की। ’’
उसमें प्रजापति को भी सृष्टा स्वीकार किया गया हैः ‘‘इसके पश्चात् जगदीश्वर सृष्टि की इच्छा से मन ही मन कुछ विचार करने लगे। हिरण्यगर्भ प्रजापति के मुख से ओ{म् शघ् प्रकट हुआ। भगवान ने उससे कहा तुम अपने स्वरूप का विभाजन करो। उस पुरुष ने वाणी पर बार-बार विचार किया कि अपने स्वरूप का विभाजन कैसे करूं, इस विषय में मुझे संदेह है-‘हरिवंश’ का इस बारे में कथन हैः ख्3,
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 11
वही पृ. 11
वही पृ. 14