306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दो ढकोसले कलियुग के संबंध में हैं। ब्राह्मणों ने इस बात पर अत्यधिक बल दिया है कि कलियुग में दो ही वर्ण हैं, ब्राह्मण और शूद्र। उनका कहना है कि क्षत्रिय और वैश्य का अस्तित्व नहीं है। इस मान्यता का आधार क्या है? इसका अर्थ क्या है? क्या वे दो वर्ण ब्राह्मणों में विलीन हो गए या उनका अस्तित्व नहीं है?
भारतीय इतिहास का वह कौन सा काल है जब यह मान्यता आरम्भ हुई?
क्या इसका अर्थ है कि इन दोनों वर्णों का ब्राह्मण में विलीन होना कलियुग का आरम्भ है?
कलियुग के संबंध में दूसरी मान्यता है कलि वर्ज्य, जिसका अर्थ है, कलियुग में किन कार्यों का निषेध है। विभिन्न पुराणों में यत्र-तत्र उनका प्रसंग है। परन्तु आदित्य पुराण में उनका संहिताबद्ध किया गया है और संग्रहीत कर दिया गया है। कलि वर्ज्य के अन्तर्गत जो व्यवहार में आता है, वह निम्नांकित हैः ख्1,
फ्1. विधवा से पुत्र उत्पन्न करने हेतु जेठ की नियुक्ति।य् ख्2,
फ्2. किसी (विवाहित) स्त्री के पति की मृत्यु के बाद उसका पुनर्विवाह ख्3, (जिसके साथ सहवास न हुआ हो।) और (जिसके साथ सहवास हो चुका हो)।य्
फ्3. तीनों ख्4, द्विज वर्णों के बीच अन्य वर्ण की कन्या से विवाह ख्5, ।य्
फ्4. आततायी ख्6, ब्राह्मण का सीधे युद्ध में भी वध ख्7, ।य्
कलि वर्ज्य, पी.वी. काणे, पृ. 8-16
यह नियोग के संदर्भ है जिसे गौतम की मान्यता प्राप्त है 18-9-14, नारद स्त्रीपम श्लोक 58 याज्ञवल्क्य की मान्तया है 1, 64-68 यद्यपि मनु ने इसकी निंदा की है 9, 64-68, बृहस्पति को भी अस्वीकार्य है।
यह विधवाओं के पुनर्विवाह के संदर्भ में है। नारद (स्त्रीपम श्लोक, 98-100) के अनुसार विधवा ब्राह्मण स्त्रियों तक को कुछ दशाओं में पुनर्विवाह की मान्यता है। पराशर का भी यही मत है जबकि वशिष्ठ (17.74) और बौधायन धर्मसूत्र (4,1.12) के अनुसार प्रथम विवाह विच्छेद बिना पुनर्विवाह कर सकती है। इस परिच्छेद को बालिका क्षतयोनिका के नाम से भी जाना जाता है। इसका अर्थ है एक विवाहित बालिका जिसका विवाह विच्छेद नहीं हुआ है जबकि दूसरे स्थान पर कहा गया है दो प्रकार की विधवाएं (जिसका विवाह विच्छेद हो गया और जिसका न हुआ हो)।
कलि वर्ज्य, पी.वी. काणे, पृष्ठ 8-16
सबसे पुरानी स्मृति में अनुलोम विवाह की अनुमति है जैसे बौधायन धर्मसूत्र 1.8.2-5, वशिष्ठ 1.24-27, मनु 3, 14-17, याज्ञवल्क्य 1, 56-57
कलि वर्ज्य, पी.वी. काणे, पृष्ठ 8-16
धर्म ग्रंथकारों ने इस विषय पर बहुत लिखा है_ मनु 8, 350-51, विष्णु 5, 180-80, वशिष्ठ 3, 15-18 में एक आततायी ब्राह्मण के वध की अनुमति देते हैं जबकि सुमंतु ने कहा है फ्किसी आततायी के वध से कोई पाप नहीं है, ब्राह्मण और गाय इसके अपवाद हैं।य् इन्होंने आततायी ब्राह्मण के वध पर प्रतिबंध लगाया है। देखें, यज्ञ पर मिताक्षरी 2, 21 इस विषय पर विचार।