चौबीसवीं पहेली
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फ्5. किसी द्विज से व्यवहार (उसके साथ खान-पान जैसा व्यवहार) जो समुद्रयात्रा पर जाता है, चाहे उसने प्रायश्चित भी क्यों न कर लिया हो ख्1, ।य्
फ्6. सात्र का उपनयन करना।य्
फ्7. कमण्डल लेकर चलना। ख्2, य्
फ्8. महायात्रा ख्3, पर जाना।य्
फ्9. गोमेध ख्4, में गाय की बलि।य्
फ्10. श्रौतमणि यज्ञ तक में मद्यपान ख्5, ।य्
फ्11-12. अग्निहोत्र के पश्चात् पुनः प्रयोग हेतु उसमें प्रयुक्त कलछी को चाटना ख्6, ।य्
फ्13. शास्त्रानुसार वैखानस जीवनयापन ख्7, ।य्
फ्14. (जन्म और मृत्यु होने पर) व्यवहार और वैदिक ज्ञान के आधार पर अशुचिता की अवधि घटाना ख्8, ।
बौधायन धर्मसूत्र 1.1.20 में समुद्रयात्रा की निंदा की गई है जो उत्तरापथ के ब्राह्मणों की विशिष्टता थी। इन्हें पतितों में सबसे पहला स्थान दिया गया है (11.1.41)। कुछ विद्वान कहते हैं कि यह प्रतिबंध बार-बार समुद्रयात्रा के विषय में है। फ्समुद्रगाय् पतित बताए गए हैं (जीवानंद पृ. 525)
बौधायन-धर्मसूत्र 1.3.4 में स्नातकों के लिए व्यवस्था है कि वे मिट्टी अथवा काठ के पात्र में पानी ले जाएं। वशिष्ठ 12.14 और मनु 4.36 और याज्ञ 1.132 भी यही कहते हैं। जबकि मदन पारिजात पृ. 15-16 में कहा गया है कि कमंडल धारण का अर्थ है चिर ब्रह्मचर्य परंतु यह सत्य नहीं है क्योंकि नारदीय पुराण में उपरोक्त का उल्लेख है कि दोनों भिन्न हैं और प्रतिबंधित हैं।
इसका संदर्भ है वानप्रस्थों के लिए पूर्वोत्तर की ओर प्रस्थान मनु छठा, 31 और याज्ञ. 3.55 और वृद्ध व्यक्तियों द्वारा महायात्रा (आत्महत्या) की प्रथा अर्थात् जब तक चलते रहना जब तक बेदम होकर गिर न जाये। प्रयाग जैसे पवित्र स्थल पर गंगा में जलसमाधि लेना अथवा अग्नि में प्रवेश कर जाना अपरार्क पृ. 536 जहां स्मृति में यह अनुमति दी गई है। उल्लेखनीय है कि मृच्छकटिकम के रचयिता शूद्रक ने रघुवंश 8, 94 के अनुसार अग्नि में प्रवेश किया था। अत्रि श्लोक 218-19 का मेधातिथि ने उल्लेख किया है कि मनु 5.88 के अनुसार राजा प्रयाग में जलसमाधि लेते थे।
देखें सांख्यायन सूत्र 14.15.1, कात्यायन स्रोत 22, 11.34 और मनु 11.74।
यह इन्द्र के लिए दी जाने वाली आहुति से मुख्यतः संबंधित है जब आश्विन, सरस्वती और इन्द्र को
तीन कटोरे मदिरा भेंट करने के लिए एक ब्राह्मण को धन देकर नियुक्त किया जाता था कि वह कव्य
प्राप्त करे। देखें तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.8.62, सांख्यायन स्रोत 15.15.1.14 और पूर्वमीमांसा सूत्र 3.5.14.5 6. देखें तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.1.4 और सत्यसाधस्त्रोत।
- आप. धर्मसूत्र 11.9.21, 18.11.9, 23.2, मनु 1-32, वशिष्ठ 9.1.11 में इस संबंध में विस्तृत नियम
दिए गए हैं।
- उपरोक्त में उद्धत पराशर जिसमें कहा गया है कि जो ब्राह्मण वैदिक ज्ञान और अग्निहोत्र में प्रवीण
है केवल एक दिन की अशुचिता (किसी निकट संबंधी की मृत्यु पर) माने जिसका केवल अध्ययन
है। वह तीन दिन की अशुचिता माने बृहस्पति ने हरदत्त के अनुसार 14.1 में कहा है कि कलियुग में
सभी के लिए समान रूप से 10 दिन की अशुचि का विधान है। याज्ञ पर विश्वरूप का विस्तृत शास्त्रार्थ
में कहना है (3.30) कि दस दिन बाद अशुचिता से मुक्ति मिल जाती है। कहा गया है कि केवल
अथर्ववेद का अर्थ है कि स्वार्थ के अभाव और सदगुणों की प्रशंसा की गई है। यह समझना युक्तिसंगत
नहीं है कि विश्वरूप को कोई महत्व दिया गया है या उसके कलिवर्ज्य पर ये श्लोक प्रसिद्ध हैं यह
पराशर के समक्ष उनकी व्याख्या में विफल न होता।