चौबीसवीं पहेली: कलियुग की पहेली - Page 323

308 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्15. प्रायश्चित स्वरूप ब्राह्मण की मौत का विधान ख्1, ।य्

फ्16. नैतिक पाप (स्वर्ण) चोरी की छोड़कर और पापियों (महापातकों) के साथ सम्पर्क होने पर (गुप्त) प्रायश्चित ख्2, ।य्

फ्17. वर, अतिथि और पितरों को मंत्रों के साथ मांस की भेंट ख्3, ।य्

फ्18. औरत ख्4, तथा दत्तक पुत्र के अतिरिक्त अन्य को पुत्रों के रूप में स्वीकार करना ख्5, ।य्

फ्19. उन व्यक्तियों के साथ प्रायश्चित के उपरांत भी सम्पर्क जिन्होंने उच्च जाति की महिला के साथ संभोग किया है ख्6, ।य्

फ्20. यदि किसी वृद्ध अथवा सम्भावित व्यक्ति की पत्नी ने परपुरुष से संभोग किया है और उसके लिए वह प्रताडि़त की गई है उसका परित्याग ख्7, ।य्

फ्21. किसी ख्8, एक व्यक्ति के लिए दूसरे का वध ख्9, ।य्

फ्22. जूठन छोड़ना ख्10,

  1. मनु (2.89 और 146) ने कहा है कि जानबूझ कर की गई ब्रह्म हत्या और मदिरापान का प्रयश्चित मृत्यु है। गौतम 21.7 का भी यही कथन है।

  2. मनु 11.54 उन अपराधियों के सम्यकों की गणना चार महापातकों के साथ पांचवे महापातक के रूप में करता है। गौतम 24 और वशिष्ठ 25 ब्रह्म हत्या के महापातकों तक के लिए गुह्य प्रायश्चित का विधान करता है। इस नियम के अनुसार ब्रह्म हत्या के लिए कलि में गुह्य प्रायश्चित की आवश्यकता नहीं है, न मदिरापान और न निकट संबंधियों के साथ संभोग करने वाले के लिए यह आवश्यक है देखें अपरार्क पृ. 1212 जिसमें उनका जिक्र है जो गुह्य प्रायश्चित करें।

  3. मधुपर्क सम्मानित अतिथियों को दिया जाता है जिसमें वर भी शामिल है। देखें गौतम 5.25-35, याज्ञ.

1.109, श्राद्ध में पितरों की संतुष्टि के लिए विभिन्न पशुओं के मांस का उल्लेख है। देखें याज्ञ.

1.258-360, मनु 3, 123 आश्वलायन गृह्य सूत्र के अनुसार (1.24-36) मधुपर्क बिना मांस के न

परोसा जाए। देखें वशिष्ठ 6.5-6

  1. काणे, कलिवर्ज्य, पृ. 8-16

  2. मनु. 9.165-80, याज्ञ. 2.128-132 और अन्य 12 प्रकार के पुत्रों का उल्लेख करते हैं।

  3. गौतम (4.20 और 22.23) निम्न जाति के व्यक्ति द्वारा उच्च जाति की स्त्री के साथ संभोग की निंदा करते हैं और उनके वंशजों को धर्महीन कहते हैं।

  4. वशिष्ठ ने 21.10 में चार प्रकार की स्त्रियों का उल्लेख किया है जैसेः वह जिसने विद्यार्थी के साथ संभोग किया हो या पति के गुरु से, वह जिसने अपने पति की हत्या कर दी हो या जो निम्न जाति के पुरुष से व्यभिचार करती हो, उन्हें त्याग देना चाहिए।

  5. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 8-12

  6. स्मृतियों में कहा गया है ब्राह्मण और गाय की रक्षा में जान की परवाह न करें, मनु 9.79 और विष्णु 3, 45

  7. वशिष्ठ 14.20.21 के अनुसार जूठन अथवा उससे छुआ भोजन न खाया जाए। इसका अर्थ है जूठन अन्य को दे देना कुछ स्मृतियों के उच्छिष्ट, शूद्रों आदि को देने की बात है, यहां उस पर प्रतिबंध है, देखें गौतम 10.61 और मनु 10.125