चौबीसवीं पहेली: कलियुग की पहेली - Page 324

चौबीसवीं पहेली

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फ्23. जीवन के लिए (पैसा लेकर) किसी देवता विशेष की मूर्ति की पूजा का संकल्प ख्1, ।य्

फ्24. मृत्यु संबंधी अशुचिता के अधीन फूल चुनने के पश्चात् उन व्यक्तियों का स्पर्श ख्2, ।य्

फ्25. ब्राह्मण द्वारा पशु की वास्तविक बलि।य्

फ्26. ब्राह्मण ख्3, द्वारा सोम पौधे का विक्रय ख्4, ।य्

फ्27. समय तक भूखा रहने के उपरांत ब्राह्मण का शूद्र से भोजन ग्रहण करना। ख्5, य्

फ्28. (ब्राह्मण) गृहस्थ का अपने शूद्र वर्ण के दास के हाथ से बना भोजन ग्रहण करना, गोशाला और उन व्यक्तियों के हाथ का भोजन करना जो उसकी बटाई पर खेती करते हैं ख्6, ।य्

फ्29. ख्7, बहुत लम्बी दूरी की तीर्थयात्रा पर जाना।य्

फ्30. गुरुपत्नी के साथ वैसा ही व्यवहार जैसा स्मृतियों में गुरु के लिए निर्धारित है ख्8, ।य्

फ्31. ब्राह्मण द्वारा विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन के लिए कल के लिए भोजन की परवाह न करना।य्

  1. मनु 3, 152 धन लेकर पूजा करने वाला ब्राह्मण श्राद्ध अथवा देव कर्म में आमंत्रित न किया जाए।

  2. फूल चुनने का कार्य दाह संस्कार के चौथे दिन किया जाए। विष्णु 19, 10-12, वैखानस स्मृतिसूत्र खण्ड 7, समवर्त श्लोक 38-39

  3. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 13

  4. कात्यायन सूत्र (7, 6ः 2-4) के अनुसार सोम कौत्स गोखीय, ब्राह्मण अथवा शूद्र से खरीदा जाए परन्तु मनु 10.88 में अन्य बातों के अतिरिक्त सोम विक्रय का निषेध करते हैं चाहे वह कृषि कार्य भी करता हो या वैश्यवृत्ति करता हो और मनु 3.158 और 170 के अनुसार सोम विक्रेता ब्राह्मण को श्राद्ध में बुलाने का कुपात्र समझते हैं।

  5. मनु 9.16 में अनुमति देते हैं कि कोदई ब्राह्मण तीन दिन से भूखा हो तो व निम्न कर्मवालों से भी एक दिन भोजन ले सकता है। याज्ञ. 3.43 के अनुसार यदि ‘हीनकर्म’ पढ़ें तो इसका अर्थ (भिक्षावृत्ति और चोरी जैसा कि नारद अभ्युपेत्य सुश्रुषा 5-7 में वर्णित है) है।

  6. यदि कोई शूद्र ब्राह्मण का दास है, नाई है, ग्वाला है, बटाई पर खेती करता है या वंशानुगत भिन्न है तो मनु स्मृति के अनुसार ब्राह्मण उसके यहां का पका भोजन भी ले सकता है, देखें गौतम 17.6, मनु 4.253, याज्ञ. 1.166 (इसका पूर्वाद्ध भी वैसा ही है), अंगिरस 120. पराशर 11

  7. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 14

  8. मनु ने 2.210 में व्यवस्था दी है कि गुरु पत्नियां यदि उसी वर्ण की हों जिसका गुरु है तो उनका सम्मान गुरु के समान किया जाए। यदि वे उसी वर्ण की नहीं तो उनकी अगवानी के लिए उठकर प्रणाम किया जाए।