चौबीसवीं पहेली: कलियुग की पहेली - Page 325

310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्32. जातकर्म ख्1, होम के समय ब्राह्मण द्वारा अरनी स्वीकार करना जिसके अनुसार शिशु के जातकर्म से उसके पाणिग्रहण तक के संस्कार कराने का कार्यक्रम हो ख्2, ।य्

फ्33. ब्राह्मण द्वारा सतंत् यात्रा।य्

फ्34. बांस की फूंकनी ख्3, के बिना आग में फूंक मारना।य्

फ्35. शास्त्रों में वर्णित प्रायश्चित के पश्चात् भी किसी ऐसी स्त्री को जाति में सम्मिलित होने की स्वीकृति देना, जो बलात्कार से कलंकित हो चुकी हो ख्4, ।य्

फ्36. संन्यासी ख्5, द्वारा सभी वर्णों (शूद्रों सहित) से भोजन की भिक्षा ग्रहण करना ख्6, ।य्

फ्37. जमीन से निकाले जाने वाले जल का पान करने हेतु दस दिन तक प्रतीक्षा।य्

फ्38. अध्यापक को दीक्षांत पर (मांगने पर) शास्त्रानुसार दक्षिणा ख्7, ।य्

फ्39. ब्राह्मण ख्8, और अन्यों के लिए शूद्रों से भोजन बनवाना ख्9, ।य्

फ्40. वृद्धों द्वारा चट्टान से अथवा आग में कूद कर आत्महत्या ख्10, ।य्

  1. गौतम 7, 1-7, आप ध. सू. 1.7, 20.11-17, 21.4, याज्ञ. 3.35, 44 और अन्य के अनुसार संकट

काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की वृत्ति कर सकता है। मनु 4.7 के अनुसार ब्राह्मण का आदर्श है

कि वह तीन दिन से आवश्यकता से अधिक का अथवा एक ही दिन का आवश्यकता से अधिक अनाज

संग्रह न करे। यहां यह कठोर सीमाएं प्रतिबंधित हैं।

  1. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 14

  2. संस्कार कौस्तुभ के गृह परिशिष्ट में ऐसा उद्धरण है।

  3. मनुस्मृति 4,53 में भी यह प्रतिबंध है। वैदिक साहित्य के अनुसार अग्नि को मुंह से फूंक मार कर प्रज्ज्वलित करने की अनुमति है। देखें आप. ध. सू. 1.5.15.20 पर हरदत्त।

  4. इतने बाद में भी स्मृति देवला (मंत्र 47) में यदि किसी स्त्री के साथ म्लेच्छ ने भी बलात्कार किया है तो 3 दिन के प्रायश्चित के बाद वह शुद्ध हो जाती है। आदित्य पुराण बेकसूर और अभागी स्त्रियों के प्रति अत्यंत कठोर है।

  5. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 15

  6. बौधायन धर्मसूत्र 2.10 में संन्यासी को सभी वर्गों से भिक्षा में भोजन मांगने की छूट है परंतु मनु (4.43) और याज्ञ. 3.59 में विधान है कि वह शाम को ही भिक्षा मांगे। वशिष्ठ (10.7) के अनुसार भी बिना पूर्ण निर्णय के 7 घरों से भिक्षा मांगे किंतु बाद में वशिष्ठ ने कहा है (10.24) कि उसे ब्राह्मणों के यहां से प्राप्त भिक्षा से ही संतुष्ट हो जाना चाहिए।

  7. याज्ञ 1.51 के अनुसार ब्रह्मचारी वेदाध्ययन और व्रत के पश्चात् गुरु को उसकी मनोवांछित गुरुदक्षिणा दे और पर्वस्नान करे।

  8. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 15

  9. आप. ध. सूत्र 2, 2.3.4 में शूद्रों को अनुमति है कि वे आर्यों की देखरेख में तीन उच्च वर्णों के लिए भोजन बनाएं।