चौबीसवीं पहेली
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फ्41. जूठे पानी का सम्मानित व्यक्तियों द्वारा आचमन, चाहे वह गाय का ही झूठा क्यों न हो ख्1, ।य्
फ्42. पिता और पुत्र के बीच विवाद ख्2, ।य्
फ्43. संन्यासी जहां रात हो जाए, वहीं शयन करें ख्3, ।य्
इस कलिवर्ज्य संहिता की सबसे अजीब बात यह है कि इसके महत्व को पूरी तरह समझा नहीं गया। इसका उल्लेख केवल इसी रूप में किया जाता है कि यह एक उन व्यवहारों की सूची है, जिन पर कलियुग में प्रतिबंध हैं। परंतु इन निषेधों की सूची से भी आगे कुछ और है। निःसंदेह कलिवर्ज्य संहिता में वर्णित सूची के व्यवहार प्रतिबंधित हैं। बहरहाल प्रश्न है कि क्या ये व्यवहार अनैतिक और निंदित हैं, पाप है या किसी दृष्टि से समाज के लिए हानिकर हैं? इसका उत्तर है नहीं। हम यह जानना चाहेंगे कि यदि यह प्रतिबंध लगाए गए हैं तो क्या वे निंदित कार्य हैं? कलिवर्ज्य संहिता की यही सबसे गूढ़ पहेली है। किसी व्यवहार को निंदित घोषित किए बिना प्रतिबंधित करना पूर्व युगीन परम्पराओं का एक विरोधाभास है। एक उदाहरण है। आपस्तंब धर्म सूत्र ने ज्येष्ठतम पुत्र को ही सारी सम्पत्ति देने के व्यवहार को प्रतिबंधित किया। लेकिन इसकी भी निंदा की। ब्राह्मणों ने यह क्या तरीका खोज निकाला कि किसी बात पर प्रतिबंध तो लगा दें परंतु उसकी निंदा न करें? इसके पीछे कोई कारण होना चाहिए। वह कौन-सा कारण है?
वशिष्ठ 3.35 के अनुसार गड्ढा में भरा पानी यदि ऐसा है जो गाय की प्यास बुझा सके तो उसका आचमन किया जा सकता है। देखें मनु 5.128 और याज्ञ. 1.192
याज्ञ. 2.239 में विधान है कि पिता-पुत्र विवाद के साक्षी को तीन पण का अर्थदण्ड दिया जाए।
इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि संन्यासी शाम को बस्ती में रहे।