परिशिष्ट-1
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यह कष्ट नहीं उठाना पड़ता। उन्हें कोई अवसर दिए बिना सीता ने अपनी पवित्रता का प्रमाण दिया। वे अग्नि-परीक्षा में सफल हुईं। इससे देवता प्रसन्न हुए और इस परीक्षा के पश्चात उन्होंने सीता को पवित्र घोषित किया। इसके पश्चात् ही राम सीता को अयोध्या ले जाने के लिए सहमत हुए। और जब वे उन्हें अयोध्या ले आए तो उन्होंने उनके साथ कैसो व्यवहार किया? वे राजा बन गए और सीता रानी। परन्तु राम तो राजा बने रहे और सीता का यह पद जल्दी ही छिन गया। यह काण्ड राम की सबसे बड़ी अपकीर्ति है। वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि राम के राजतिलक के कुछ समय पश्चात् ही सीता गर्भवती हो गई। ऐसा सुनकर कि सीता गर्भवती है, दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों ने विषदमन किया कि ऐसा लगता है कि सीता जब लंका में थीं तो वे रावण से गर्भवती हुईं। उन्होंने राम पर अक्षेप लगाया कि वे एक ऐसी स्त्री को पत्नी के रूप में वापस ले आए। इस कानाफूसी को राम की राजसभा का विदूषक भद्र महल में लेकर आया। राम स्वाभाविक रूप से ऐसे लांछन को सुनकर स्तंभित रह गए। वे जुगुप्सा से भर उठे। यह स्वाभाविक भी था। प्रश्न यह था कि इस अपयश से किस प्रकार मुक्ति पाई जाए? इस कलंक से मुक्ति का उन्हें सरलतम उपाय यह मिला कि सीता को त्याग दिया जाए। एक स्त्री को, जो गर्भावस्था में है, न कोई दासी, साधनों के बिना जंगलों में छोड़ देना और यह भी उसे पूर्वसूचना दिए बिना! इसमें कोई संदेह नहीं कि सीता को अचानक त्याग देने का विचार ही उनके मन में न आया होगा। विचार उत्पन्न होने और उसके पनपने और कार्यरूप देने की योजना बनाने में कुछ समय अवश्य लगा होगा। जब भद्र ने उन्हें नगर में होने वाली अफवाहों के विषय में बताया तो उन्होंने अपने भाइयों को बुलाया और उन्हें अपनी भावनाएं बताईं। राम ने कहा फ्सीता की पवित्रता और सतीत्व लंका में ही प्रमाणित हो चुके थे। देवों ने भी इसका अनुमोदन किया था और उन्हें सीता की सच्चाई, पवित्रता और सतीत्व पर विश्वास है। इसके बावजूद प्रजा सीता पर लांछन लगाती है और मुझ पर उंगली उठाती है। ऐसा अपमान कोई नहीं सह सकता। सम्मान सबसे बड़ी सम्पत्ति है। देवता और महापुरुष उसे क्षति नहीं पहुंचने देते। मैं यह अपमान और अपकर्ष नहीं सह सकता। ऐसी अपकीर्ति से बचने के लिए मैं तुम्हें भी छोड़ सकता हूं। ऐसा न समझना कि मैं सीता को त्यागने में संकोच करूंगा।य्
इससे पता चलता है कि उन्होंने सीता को त्यागने का मन बना लिया था, यह विचार किए बिना कि जो वे कर रहे हैं, वह सही है या गलत। उन्होंने प्रजा के लांछनों से बचने का सरलतम उपाय ही अपनाया। सीता के जीवन का कोई मूल्य नहीं। मूल्य था तो उनकी प्रतिष्ठा का। उन्होंने प्रजा में ऐसी अफवाहें रोकने का कोई प्रयत्न नहीं किया, जो एक राजा के रूप में उनका कर्त्तव्य था, जो एक स्त्री के पति के रूप में उनका दायित्व था जिसकी वे परीक्षा ले चुके थे। वे प्रजा की कानाफूसी के आगे झुक गए। हिंदुओं में ऐसे लोगों का अभाव नहीं है, जो प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं कि राम एक प्रजातांत्रिक राजा था। किन्तु ऐसे लोग पर्याप्त संख्या में हैं जो उन्हें दब्बू और भीरु मानते हैं।