परिशिष्ट-I: राम और कृष्ण की पहेली - Page 333

318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा की यह क्रूर योजना उन्होंने अपने भाइयों को तो बता दी किन्तु सीता को नहीं बताई, जिनसे उनका प्रत्यक्ष संबंध था। क्योंकि वही प्रभावित होनी थी तो उन्हीं को बताया जाना चाहिए था। परन्तु उन्हें पूर्ण अंधकार में रखा गया। राम सीता से उस रहस्य को छिपाए रहे, जब तक उस पर पालन न हो गया। सीता के दुर्भाग्य से वह समय भी आया, जब उनकी प्रतीक्षित योजना क्रियान्वित हुई। जो स्त्रियां गर्भवती होती हैं, उनके मन में छोटी-मोटी ललक हुआ करती है। राम यह जानते थे। इसलिए एक दिन उन्होंने सीता से पूछा कि तुम्हारा किसी वस्तु को मन तो नहीं करता है। उन्होंने कहा, ‘हां’ करता है। राम ने पूछा, फ्वह क्या है।य् सीता ने कहा, ‘वह गंगा किनारे किसी ऋषि के आश्रम में कंद-मूल खाकर कम से कम एक रात बिताना चाहती हैं।’ राम को और क्या चाहिए था। तपाक से हां भर दी, फ्निशि्ंचत रहो प्रिये! मेरी कोशिश होगी कि तुम्हें कल ही भेज दूँ।य् सीता ने इसे सीधे स्वभाव से लिया। परन्तु राम ने क्या किया? उन्होंने सोचा सीता से पिण्ड छुड़ाने का यह अच्छा अवसर है। उन्होंने अपने भाइयों से कहा कि वे सीता के संबंध में बीच में न आएं और यदि आते हैं तो शत्रु समझे जाएंगे। तब उन्होंने लक्ष्मण से कहा, फ्वह सेवेर ही सीता को गंगा के किनारे जंगल में आश्रम में छोड़ आएं।य् लक्ष्मण किंकर्त्तव्यमूढ़ थे कि वे सीता को राम का फैसला कैसे बताएं? उनकी मनोदशा को पहचानते हुए राम ने, लक्ष्मण को बताया कि सीता ने स्वयं ही इच्छा प्रकट की है कि वे कुछ समय आश्रम में गंगा किनारे बिताना चाहती हैं। इससे लक्ष्मण को थोड़ा धैर्य बंधा। यह दुरभिसंधि रात को हुई थी। सवेरे कहीं लक्ष्मण ने सुमंत से कहा कि वह रथ के घोड़े तैयार करें। सुमंत ने लक्ष्मण को बताया कि सब तैयार है। तब लक्ष्मण रनिवास में गए और सीता से मिले कि वे कुछ दिन आश्रम में बिताना चाहती हैं। राम ने अपना वायदा निभाते हुए, उनसे ऐसा करने को कहा है। उन्होंने कहा, फ्वह रथ खड़ा है चलिए।य् सीता राम का आभार मानकर रथ पर चढ़ गई। लक्ष्मण और सीता को बिठाकर सुमंत निर्दिष्ट स्थान की ओर चल दिए। अंत में वे गंगा के किनारे पहुंच गए, केवटों ने उन्हें पार उतार दिया। लक्ष्मण सीता के चरणों में गिर पड़े और आंखों से गर्म-गर्म आंसू टपकाते हुए कहा - फ्हे निर्दोष रानी! मेरी करनी पर मुझे क्षमा करो। मुझे आदेश है कि मैं तुम्हें यहीं छोड़ जाऊं क्योंकि लोग आपके कारण राम पर आक्षेप करते हैं।य्

राम ने सीता को त्याग दिया और उनके हाल पर जंगल में छुड़वा दिया। वे पास ही वाल्मीकि के आश्रम में चली गईं। वाल्मीकि ने उन्हें शरण दी। सीता ने वहीं जुड़वा पुत्रों-लव और कुश को जन्म दिया। तीनों वाल्मीकि के यहां रहने लगे। वाल्मीकि ने बालकों का लालन-पालन किया और उन्हें रामायण की कथा गायन सिखाया, जो उन्होंने स्वयं रची थी। राम के राज्य के पास ही वे बालक 12 वर्ष तक जंगलों में ऋषि के आश्रम में पलते रहे। आदर्श पति और प्रिय पिता ने यह जानने की कभी चेष्टा नहीं