परिशिष्ट-I: राम और कृष्ण की पहेली - Page 334

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की कि सीता जीवित है या मर ही गई। राम 12 वर्ष पश्चात् सीता से अद्भुत दशा में मिले। राम ने एक यज्ञ किया और उसमें सभी ऋषियों को भाग लेने के लिए बुलाया। राम ने जान-बूझकर वाल्मीकि को आमंत्रित नहीं किया। परन्तु वाल्मीकि अपनी ओर से ही सीता के दोनों पुत्रों को, अपने शिष्यों के रूप में साथ लेकर यज्ञ में पहुंच गए। जब यज्ञ चल रहा था तो दोनों बालकों ने सभा में रामायण का गायन आरम्भ किया। राम बड़े आनन्दित हुए और बालकों के विषय में पूछा तो उन्हें बताया गया कि वे सीता के पुत्र हैं। तब उन्हें सीता की याद आई परंतु फिर भी उन्होंने क्या किया? वे सीता के पास नहीं गए। उन्होंने अबोध बालकों को बुलाया, जो अपने माता-पिता के पाप के विषय में कुछ नहीं जानते थे। वे तो एक अत्याचार के शिकार थे। उन्होंने वाल्मीकि से कहा कि फ्सीता यदि पवित्र और सती हैं तो वे सभा में आएं और अपने ऊपर लगाए गए कलंक को धोकर अपना सतीत्व प्रमाणित करें। आखिर, वे लंका में ऐसा कर चुकी हैं।य् ऐसा तो उन्हें जंगल में छोड़ जाने से पूर्व भी कहा जा सकता था। राम ने ऐसा कोई वचन भी नहीं दिया कि परीक्षा में सफल हो जाने पर वे सीता को फिर रख लेंगे। वाल्मीकि ने सीता को सभा में प्रस्तुत किया। जब पति-पत्नी आमने-सामने थे, वाल्मीकि बोले, फ्हे दशरथ के पुत्र यह सीता खड़ी हैं, जिसे तुमने लोगों की कानाफूसी के कारण त्याग दिया था, जिन्हें मैंने अपने आश्रम में पाला है।य् राम ने कहा, फ्मैं जानता हूं कि सीता पवित्र है और यह मेरे पुत्र हैं। इन्होंने लंका में भी अपने सतीत्व का प्रमाण दिया है। मैं इन्हें साथ ले आया परन्तु लोगों को अभी सन्देह है। सीता वह परीक्षा यहां भी दे, जिसे सभी ऋषि और प्रजा भी देख ले।य्

सीता ने नेत्र भूमि पर गड़ाए। दोनों हाथ जोड़कर प्रण लिया, फ्यदि मैंने सपने में भी राम को छोड़कर, कभी किसी व्यक्ति का विचार भी किया हो तो धरतीमाता तू फट जा और मुझे अपने में समा ले। यदि मैंने सदा राम को प्चयार किया हो, मेरे कार्यों और विचारों में वही बसे हों तो धरतीमाता तू फट जा और मुझे अपने में समा ले।य् जब उन्होंने यह प्रतिज्ञा दोहराई तो धरती फट गई। एक स्वर्ण सिंहासन उभरा। वह उस पर विराज गईं। आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई। सभी देखकर आनन्दविभोर हो गए।

इसका अर्थ है कि सीता ने राम के पास वापस जाने के बजाय मर जाना बेहतर समझा। जिस राम ने उसके साथ कसाई से अच्छा व्यवहार नहीं किया था, यह उस सीता की गति और राम का पाप था।

राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। क्या इससे यह प्रमाणित होता है?

वास्तविकता यह है कि राम ने कभी राजपाट किया ही नहीं। वह तो सांकेतिक राजा थे। वाल्मीक के अनुसार शासन-कार्य भरत देखते थे। राम ने राज-काज और प्रजा की चिंताओं से मुक्ति पा ली थी। राम के राजा बनने के बाद की दिनचर्या का