परिशिष्ट-I: राम और कृष्ण की पहेली - Page 338

परिशिष्ट-1

होकर धरती पर गिर पड़ा। कृष्ण उसकी गर्दन कसकर पकड़े हुए थे।

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अगला चमत्कार दो अर्जुन वृक्षों को उखाड़ना था, जो पास-पास खड़े थे। ये दोनों यक्षों के शरीर थे, जो शापवश वृक्ष बन गए थे और जिन्हें कृष्ण ने शापमुक्त किया। जब कृष्ण घुटनों के बल चलने लगे और नित नया उत्पात करने लगे तो यशोदा ने एक रस्सी लेकर उन्हें ओखली से बांध दिया जो भयानक शोर करते हुए गिर पड़ी, और कृष्ण को आंच भी न आई। यह सब देखकर नंद भयभीत हो गए और ब्रज छोड़कर अन्यत्र जाने का विचार करने लगे। जब वह ऐसा विचार कर रहे थे, भेडि़यों ने आतंक मचा दिया। वे पशुओं को उठाकर ले जाते थे। पूरी अव्यवस्था फैला दी। इससे उन खानाबदोशों ने ब्रज छोड़ने का इरादा कर लिया और वे सुंदर स्थान वृंदावन में चले आए। तब कृष्ण मात्र सात वर्ष के थे।

नए स्थान पर आकर, कृष्ण ने अनेक असुरों का संहार किया। उनमें से एक अरिष्ट था जो एक वृषभ के रूप में आया। दूसरा था-केशिन, जिसने घोड़े का रूप धरा। पांच अन्य थे, वृत्रासुर, वकासुर, अघासुर, भोमासुर और संखासुर और अंत में यक्ष। इन सबसे महत्वपूर्ण था कालिया, सर्पों का राजा, जो अपने परिवार सहित यमुना की एक दह में रहता था और जिसने यमुना का जल दूषित कर दिया था। एक दिन कृष्ण कालिया के फन पर चढ़ गए और इतने जोर से नाचे कि उसने खून का वमन किया। कृष्ण उसे मार ही डालते परन्तु नाग-परिवार के अनुनय-विनय पर उन्होंने उसे छोड़ दिया और अन्यत्र जाने दिया।

कालिया विजय के पश्चात् वस्त्रहरण की घटना आती है, जो कृष्णोपासकों और पौराणिक प्रशंसकों के लिए एक धर्म-संकट है। पूरा वर्णन इतना अश्लील है कि उसका संकेत मात्र भी देना कठिन है क्योंकि वह सुपाठ्य नहीं है। परन्तु हम उसे यथासंभव शिष्ट रूप में उद्धृत कर रहे हैं जिससे कि कृष्ण के जीवन की झांकी मिल सके। देश के कुछ भागों में प्रचलित रीतियों के अनुसार कुछ गोपियां यमुना के किनारे वस्त्र छोड़कर नदी में नहा रही थीं। कृष्ण ने उनके कपड़े उठा लिये और नदी के किनारे एक वृक्ष पर चढ़ गए। जब उन्होंने अपने वस्त्र मांगे तो उन्होंने उस समय तक वस्त्र देने से इंकार कर दिया जब तक अपने वस्त्र लेने वे वृक्ष तक स्वयं चल कर न आएं। जब वे आ गईं तो कृष्ण प्रसन्न हुए और वस्त्र लौटा दिए। यह कथा भागवत में है।

कृष्ण की दूसरी महिमा गोवर्धन पर्वत उठाना है। गोप वर्षा के देवता इन्द्र की वार्षिक पूजा की तैयारी कर रहे थे। उसके लिए भारी आयोजन हो रहा था। कृष्ण ने कहा कि फ्वे तो चरवाहे हैं, कृषक नहीं हैं, उनका वास्तविक देवता गौधन है, पर्वत और जंगल हैं, उन्हें इनकी ही पूजा करनी चाहिए। इन्द्र ऐसे देवता ही नहीं, जो वर्षा कराते हैं।य् गोप मान गए और इन्द्र की पूजा के स्थान पर नाच-गाकर गोवर्धन पर्वत