324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की पूजा की, जो गुरुओं का पालक है। इन्द्र को तो इससे क्रुध होना ही था और उन्हें दण्ड देने के लिए सात दिन तक रात-दिन वर्षा की। कृष्ण झुके नहीं। कृष्ण ने पर्वत को उखाड़ लिया और गांव के ऊपर छतरी की तरह तान दिया और इन्द्र के कोप से होने वाली वर्षा से होने वाली बर्बादी से पशुओं और गायों को बचा लिया। मैं पहले भी अपने प्रथम व्याख्यान में इन्द्र और ऋग्वेद के कृष्ण और बाद में शतपथ ब्राह्मण के कृष्ण और विष्णु के बीच का वैमनस्य वर्णित कर चुका हूं।
कृष्ण की युवावस्था में रासलीला के माध्यम से वृंदावन की गोपिकाओं के साथ उनके अवैध संबंधों की भरमार है। इस लीला में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के हाथों में हाथ डालकर नृत्य करते हैं। देश की कुछ वन्य जनजातियों में यह नृत्य अब भी प्रचलित है। यह कहा गया है कि कृष्ण वृन्दावन की युवा गोपियों के साथ प्रायः इस नृत्य के साथ मनोविनोद किया करते थे। विष्णु पुराण, हरिवंश पुराण और भागवत में ऐसे नृत्य का वर्णन है। इन सब लेखकों ने यह समझाने की चेष्टा की है कि कृष्ण के प्रति गोपिकाओं का प्रेम भक्तिभाव के कारण था, उसमें वासना रंच मात्र भी नहीं है। अन्य व्यक्तियों के विषय में इन्हीं लेखकों ने इसे अत्यधिक निंदित बताया है। ऐसे दृश्य, समय और ऋतु में मधुर संगीत के बीच स्त्रियों का मेल, नृत्य और कृष्ण तथा उनकी कामुकता और उनके हावभावों की सामान्य मनोवृत्ति पर सब सहमत हैं। परन्तु विष्णु पुराण में कुछ हद तक शिष्टता है। वैसे कहीं-कहीं वह भी विचलित हो जाता है, ‘हरिवंश’ में स्पष्ट रूप से अशिष्टता है परन्तु भागवत तो नितांत अशोभनीय है।
इस सब दुष्कर्मों से बढ़कर कृष्ण के जीवन में राधा नामक गोपी के बीच अवैध संबंधों की कहानी है ब्रह्मवैतर्त पुराण में इन अवैध संबंधों का चित्रण है। रुक्मिणी कृष्ण की ब्याहता और भार्या है। राधा का विवाह ..... से हुआ था। कृष्ण ने अपनी विवाहिता पत्नी रुक्मिणी को त्याग दिया और किसी अन्य की पत्नी के साथ
खुल्लमखुल्ला रहने लगे।
कृष्ण एक योद्धा भी थे और बाल्यकाल से ही राजनीतिज्ञ भी। उस समय उनकी आयु बारह वर्ष बताई जाती है। उनका प्रत्येक कार्य, चाहे युद्ध हो अथवा राजनीति, सब अनैतिक था। उनका सर्वप्रथम कार्य अपने मामा कंस की हत्या था। इसके लिए ‘हत्या’ शब्द कोई कठोर अभिव्यक्ति नहीं है। कंस ने यद्यपि उन्हें बार-बार क्रोध दिलाया तो भी उसे उन्होंने युद्ध में अथवा द्वंद्व में पराजित नहीं किया। आख्यान इस प्रकार है कि वृंदावन में कृष्ण की वीरताओं को सुनकर कंस आशंकित हो उठा और उसने निश्चय किया कि एक प्रदर्शन युद्ध में उसका वध किया जाए। इसी के अनुसार उसने धर्मयुद्ध का आयोजन किया जिसे धनुष यज्ञ कहा गया। उसने कृष्ण, बलराम और उनके साथी गोपों को इसके लिए आमंत्रित किया। कृष्ण का एक अनुषंगी परन्तु कंस का एक अधिकारी अक्रूर दोनों भाइयों को मथुरा लाने के लिए भेजा गया। वे