परिशिष्ट-I: राम और कृष्ण की पहेली - Page 340

परिशिष्ट-1

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सब कंस वध के लिए कटिबद्ध थे। उसने उन्हें और अन्य यादवों को उकसाया कि वे मथुरा चलें। दोनों भाइयों ने एक षडयंत्र रचा। मथुरा आने पर उन्होंने साधारण गोपों के वस्त्र त्यागकर अच्छे वस्त्र धारण करना चाहा और कंस के धोबी से वस्त्र मांगे, जो उन्हें गलियारे में मिल गया था। उस धोबी ने उनके साथ अशिष्टता दिखाई। उन्होंने उसे मार डाला और मनचाहे वस्त्र ले लिए। तब वे कुब्जा से मिले, जो एक कुबड़ी स्त्री थी और कंस के यहां इत्रफरोश (गंधी) थी। उनके अनुरोध पर उसने उनका चंदनलेपन किया। इसके बदले में कृष्ण ने उसका कूबड़ ठीक कर दिया। भागवत में कहा गया है कि कृष्ण उससे अक्सर बराबर मिलने जाते। उनके मिलन को भागवत में चारित्रिक हीनता की कोटि का बताया गया है। फिर भी उस समय कुब्जा के चंदनलेपन से सुगंधित, सुदामा नामक माली से हार पहनकर यज्ञशाला में घुस गए और जिस ध नुष को यज्ञ के लिए रखा गया था, वह तोड़ डाला। भयभीत कंस ने कुबलयापीड नामक हाथी को उन्हें कुचलने के लिए भेजा। कृष्ण ने हाथी का वध कर दिया और मल्लशाला में घुस गए। वहां दोनों भाइयों ने कंस के विख्यात मल्लयोद्धा चाणूर, मुष्टिक, तोशालक और आंध्रा से सामना किया। चाणूर और तोशालक का संहार कृष्ण ने किया और शेष दो को बलराम ने मौत के घाट उतार दिया। कृष्ण-वध की अपने योजना से विचलित होकर कंस ने दोनों भाइयों और उनके साथियों को खदेड़ने के आदेश दिए। उसने कहा, फ्इनके पशु जब्त कर लो और वसुदेव, नंद और उग्रसेन का वध कर दो।य् इसे सुनकर कृष्ण मंच पर आ गए जहां कंस बैठा था। उसके बाल पकड़ उसे नीचे खींच लिया और धरती पर गिरा कर उसका वध कर दिया। कंस की बिलखती रानियों को सांत्वना देकर उसका राजकीय ढंग से दाह-संस्कार कराया। उग्रसेन ने उन्हें राज सौंपना चाहा। उन्होंने इंकार कर दिया। उसी को राजा बनाया और उसके छिपे हुए संबंधियों को मथुरा बुला लिया।

कृष्ण का दूसरा संग्राम कालयवन और जरासंध से हुआ जो मगध का राजा था। जरासंध कंस का दामाद था। जब उसने कृष्ण द्वारा कंस-वध का समाचार सुना तो वह मथुरा पर चढ़ गया। कहा जाता है कि उसने सत्रह बार मथुरा पर आक्रमण किया परन्तु प्रत्येक बार उसे कृष्ण ने मार भगाया। अगले आक्रमण को और विनाशकारी समझकर मथुरा त्याग कृष्ण यादवों को लेकर गुजरात प्रायद्वीप के द्वारका चले गए। यादवों के मथुरा चले जाने पर जरासंध के कहने पर कालयवन ने मथुरा को घेर लिया। जब वह निशस्त्र कृष्ण का पीछा कर रहा था तो मुचुकंद के नेत्रों से निकली ज्वाला से आक्रमणकारी भस्म हो गया। जो गुफा में सो रहा था और जिसे कालयवन ने कृष्ण समझकर उस पर आघात किया था। कृष्ण ने कालयवन की सेना को परास्त कर दिया किन्तु जब वे लूट का माल लेकर भाग रहे थे तो जरासंध ने घेर लिया। वे एक पहाड़ी पर चढ़ गए और वहां से कूदकर द्वारिका की तरफ भाग गए।