परिशिष्ट-I: राम और कृष्ण की पहेली - Page 342

परिशिष्ट-1

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कि वह एक वीर क्षत्रिय की तरह स्वयंवर से पूर्व ही उसका हरण कर ले। पहले तो यादव इस कृत्य पर उबल पड़े परंतु जब उन्हें कृष्ण ने समझाया कि अर्जुन सुभद्रा का उत्तम पति होगा और उसका हरण करके अर्जुन ने कुछ अनुहोनी भी नहीं की है तो वे मान गए। और वे कर भी क्या सकते थे? कृष्ण ने सामान्य जन की भांति केवल तर्क ही नहीं दिए थे, बल्कि स्वयं ऐसा करके उदाहरण प्रस्तुत कर चुके थे।

यह भी जानने योग्य तथ्य है कि कृष्ण ने जरासंध और शिशुपाल से कैसे जान छुड़ाई जिसने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में विघ्न डाला था। जरासंध ने रुद्र की बलि चढ़ाने के लिए अनेक राजाओं को बंदी बना रखा था। जब तक उसका वध न किया जाता और बंदी राजा मुक्त न कर लिए जाते, फिर युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार करने न आते तो उनका चक्रवर्ती सम्राट होने का दावा पूर्ण न होता। इसलिए कृष्ण ने भीम और अर्जुन को साथ लेकर जरासंध की राजधानी राजगृह को प्रस्थान किया और उसे चुनौती दी कि वह इनमें से किसी एक के भी साथ द्वंद्वयुद्ध कर ले। कोई क्षत्रिय और जरासंध जेसा ऐसी चुनौती को अस्वीकार नहीं कर सकता था। उसने प्रतिद्वंद्वी के हाथों अपने वध का अनुमान लगाकर अपने पुत्र सहदेव को अपना उत्तराधिकारी चुना और भीम से लड़ने की घोषणा की। मल्लयुद्ध तेरह दिन तक चलता रहा और अंत में जरासंध का दुःखद वध हुआ। जरासंध के पुत्र सहदेव को गद्दी पर बैठाकर और मुक्त किए राजाओं को युधिष्ठिर के यज्ञ में उपस्थित होने के लिए आमंत्रित करके कृष्ण मित्रों सहित इन्द्रप्रस्थ चले आए।

समय पर राजसूय का आयोजन हुआ। उत्सव से सम्बद्ध अनेक रीतियों में से ब्राह्मणों के चरण धोने का कार्य कृष्ण को सौंपा गया। महाभारत में अपेक्षाकृत आधुनिकता का यह स्पष्ट संकेत था। प्राचीन काल में यद्यपि ब्राह्मणों की क्षत्रियों पर श्रेष्ठता स्थापित हो चुकी थी किन्तु क्षत्रिय उन्हें ऐसा सम्मान नहीं देते थे। बहरहाल, जब यज्ञ समाप्त हो गया और सभा में उपस्थित राजाओं, पुरोहितों और अन्यों को सम्मिलित करने का समय आया तो अग्र सभासद कौन बने? यह प्रश्न उठा। युधिष्ठिर ने जब भीष्म से पूछा तो उन्होंने परामर्श दिया कि सर्वप्रथम कृष्ण का सम्मान किया जाए। तदनुसार युधिष्ठिर के कहने पर सहदेव ने कृष्ण का सम्मान करने के लिए अर्घ्य चढ़ाया और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। इससे शिशुपाल भड़क उठा। उसने कृष्ण को प्रथम सभासद बनाए जाने को चुनौती देते हुए, अपने लम्बे भाषण में पाण्डवों को अपशब्द कहे और कृष्ण को लताड़ा कि उन्होंने सम्मान को स्वीकार कर अनाधिकृत कर्म किया। इसके पश्चात् भीष्म उठे और उन्होंने कृष्ण के कार्यों और उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उनके देवत्व का वर्णन किया। शिशुपाल फिर उठ खड़ा हुआ। भीष्म की