पांचवी पहेली
ब्राह्मणों की इस माया की क्या तुलना कि वेद
न मनुष्य रचित है न भगवान की सृष्टि?
वैदिक ब्राह्मण वेदों को संशय-रहित कहने से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि वेद अपौरुषेय हैं। इसका अर्थ है वेद मनुष्यों द्वारा नहीं रचे गए। यह सिद्धांत निस्संदेह उन्हें संशय रहित बनाता है। क्योंकि यह मनुष्य की रचना नहीं है, इसलिए इसमें त्रुटि, संशय और दोष नहीं हो सकता जो मानव-रचना से संभव है। इसलिए ये संशय-रहित हैं। कुछ भी हो इस सिद्धांत पर अलग से विचार किया जाना आवश्यक है क्योंकि यह एक स्वतंत्र सिद्धांत है।
क्या वास्तव में वेदों की रचना किसी मानव ने नहीं की? क्या वे सचमुच ही अपौरुषेय थे? इस विषय में सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य अनुक्रमणी में है जो प्राचीन संस्कृत साहित्य में विशेष प्रकार के साहित्य का भाग है। अनुक्रमणी प्राचीन वैदिक साहित्य की क्रमवार विषय-सूची है। प्रत्येक वेद की अनुक्रमणी है। कहीं-कहीं एक से अधिक भी हैं, ऋग्वेद की सात अनुक्रमणी उपलब्ध हैं, इनमें से पांच शौनक की, एक कात्यायन की और एक किसी अज्ञात विद्वान की तैयार की हुई है। यजुर्वेद की तीन हैं, इनमें तीन शाखाओं में से प्रत्येक की एक है। ये हैं, आत्रेयी, चारारण्य और मध्यांदिन। सामदेव की दो अनुक्रमणी हैं। एक का नाम आर्षेय ब्राह्मण है और दूसरी का परिशिष्ट है। अथर्ववेद की एक अनुक्रमणी है। इसका नाम बृहत-सर्वानुक्रमणी है।
प्रोफेसर मैक्समूलर के अनुसार कात्यायन की ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी स्वयं में सम्पूर्ण है। इसकी महत्ता इस कारण है कि इसमें, (1) प्रत्येक मंत्र का प्रथम शब्द दिया है, (2) मंत्रों की संख्या है, (3) संकलन-कर्ता ऋषि और उसकी परम्परा का नाम, (4) देवता का नाम, और (5) प्रत्येक छंद का नाम दिया है। सर्वानुक्रमणी के संदर्भ से यह आभास मिलता है कि विभिन्न ऋषियों ने मंत्रों की रचना की और उनका सम्पूर्ण संकलन ऋग्वेद बना। ऋग्वेद अनुक्रमणी के अनुसार यह साक्ष्य मिलता है कि यह वेद पौरुषेय है। अन्य वेदों के विषय में भी यही निष्कर्ष हो सकता है। पौरुषेय अनुक्रमणी यथार्थ है, यह ऋग्वेद के मंत्रों से पता चलता है कि जिनमें ऋषि