पांचवी पहेली
अपने को वेदों का संयोजक मानते हैं।
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कुछ ऐसे उद्धरण निम्नांकित हैंः
‘‘कण्वों ने तुम्हारे लिए स्तुति की है, उनकी स्तुति सुनो।’’ ‘‘हे इन्द्र, अश्वों के सारथी अपनी प्रभावोत्पादकता हेतु गौतम का मंत्र सुनो।’’
‘‘तेरे तेजवर्धनार्थ, हे ऐश्वर्यमान अश्विन मानस द्वारा प्रभावोत्पादक मंत्रों की रचना की गई है।’’
‘‘हे अश्विन, यह सार्थक उपासना मंत्र तेरे लिए गृत्समद ने उच्चारा है।’’
‘‘हे इन्द्र, तू प्राचीन है जो अश्वों को जोतता है, तेरे लिए गौतम के वंशज नौधी ने नया मंत्र रचा है।’’
‘‘सो हे पुरोधा, प्रश्रय हेतु गृत्समद ने मंत्र रचा है जैसे मनुष्य निर्माण करता है।’’
‘‘ऋषियों ने इन्द्र के लिए एक प्रभावोत्पादक रचना की है और प्रार्थना की है।’’
‘‘हे अग्नि, यह मंत्र तेरे लिए रचा है, अपनी गऊओं और अश्वों का सुख भोग’’
‘‘हमारे पिता इन्द्र के मित्र अयाश्य ने सप्त शीर्ष पवित्र सत्य जन्य इस चौथे महान मंत्र का आह्वान किया है।’’
‘‘हम रहूगणों ने अग्नि के लिए मधुभाषा में मंत्रोच्चार किया है, हम उनका गुणगान करते हैं।’’
‘‘सो आदित्यों, अदिति और सत्ता-सम्पन्न गण प्लाति पुत्र ने तुम्हारी स्तुति की है। गया ने स्वर्गीय देवों की प्रशस्ति गाई है।’’
‘‘इसी को वे ऋषि पुरोहित यज्ञकर्ता कहते हैं, स्तुति गायक, मंत्रोच्चारक कहते हैं, वही (अग्नि के) तीन शरीरों को जानता है। वही वरदानों की वर्षा करने वाला प्रमुख है।’’
अनुक्रमणिकाओं के अतिरिक्त और भी साक्ष्य हैं, जिनसे पता चलता है कि वेद अपौरूषेय नहीं हैं। ऋषि वेदों को मानवकृत और ऐतिहासिक रचना मानते हैं। ऋग्वेद के मंत्र पूर्ववर्ती और तत्कालीन मंत्रों के बीच भेद करते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैंः
‘‘अग्नि, जिसकी पूर्ववर्ती और साथ ही वर्तमान ऋषि भी स्तुति करते हैं, शुभ करेगा।’’