छठी पहेली: वेदों की विषय-सामग्री : क्या वे कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य रखते हैं? - Page 47

32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सबसे सशक्त उदाहरण चार्वाक का है।

चार्वाक ने वेदों ख्1, के विरुद्ध जो तर्क दिए हैं, उन तर्कों का खंडन किया गया है। प्राचीन साहित्य में चार्वाकों का उल्लेख उनकी भर्त्सना के संदर्भ में किया गया हैः

‘‘यदि आपको इस पर आपत्ति है कि यदि परलोक में सुख जैसा कुछ नहीं है

तो बुद्धिमान अग्निहोत्र क्यों करें? बलि क्यों दे? जिन पर भारी अपव्यय होता है

और थकान होती है, आपकी आपत्ति को कोई भिन्न साक्ष्य नहीं माना जा सकता,

क्योंकि अग्निहोत्रादि जीविकोपार्जन के साधन मात्र हैं, क्योंकि वेद में तीन दोष

हैं अर्थात् मिथ्याकथन, अन्तर्विरोध और पुनरुक्ति। फिर ढोंगी लोग जो स्वयं को

वैदिक पंडित बताते हैं, बहुत ही शरारती हैं। क्योंकि ज्ञान-मार्गियों की जड़ खोदने

कर्मकांडी आ धमकते हैं और कर्मकांडियों के विरोधी ज्ञानमार्गी, कर्मकांड की

धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकते हैं और अंत में तीनों वेद असंबद्ध चारणों का गेय

काव्य है। जो पोंगापंथियों के वाव्Q चातुर्य के कारण आज तक विद्यमान हैं, और

इसी कारण यह लोक धारणा प्रचलित हैः

‘‘अग्निहोत्र, तीन वेद, तापसवृत्ति, तीन पद और भस्म रमाकर कुरूप होना, ये

उनकी कमाई के धंधे हैं,’’ और बृहस्पति के कथानानुसार ‘‘मनुष्यता और बुद्धि

से कोई सरोकार नहीं है।’’

बृहस्पति भी इसी मत के अनुयायी थे। चार्वाक की अपेक्षा बृहस्पति वेदों के विरुद्ध अधिक कठोर एवं उग्र थे। जैसा कि माधवाचार्य ने उद्धृत किया ह।ै बृहस्पति ख्2, का तर्क हैः

‘‘स्वर्ग की कोई सत्ता नहीं है, मोक्ष कुछ नहीं है। पुनर्जन्म होता है। न चार जातियों का कोई कर्म आदि प्रभाव डालते हैं। अग्निहोत्र, तीनों वेद, तापस-वृत्ति तीन-पद भस्म रमाकर कुरूप होना... उनकी कमाई के धंधे हैं जिनमें बुद्धि और मनुष्यता का भाव नहीं है, ज्योतिस्तोम संस्कार में यदि कोई जीव काट दिया जाता है और यदि वह सीधे स्वर्गगामी होता है तो बलिदाता अपने पिता की बलि क्यों नहीं दे देता?

यदि श्राद्ध से मृतक संतुष्ट होते हैं तो इहलोक में भी जब कोई यात्रा आरंभ करता है तो यात्रा के प्रबंध करना व्यर्थ हैं?

यदि श्राद्ध से परलोक में संतुष्टि होती है तो इहलोक में उन्हें भोजन क्यों नहीं दिया जाता? जो स्वर्ग से विमान आने की प्रतीक्षा में बैठे हैं।

  1. सर्व दर्शन संग्रह, पृ. 10

  2. वही, (पृ. संख्या का उल्लेख नहीं है)।